धरोहर

रत्नसेन-देवपाल-युद्ध-खंड-55 पद्मावत/जायसी

सुनि देवपाल राय कर चालू । राजहि कठिन परा हिय सालू ॥ दादुर कतहुँ कँवल कहँ पेखा । गादुर मुख न सूर कर देखा ॥ अपने रँग जस नाच मयूरू । तेहि सरि साध करै तमचूरू ॥ जों लगि आइ तुरुक गढ़ बाजा । तौ लगि धरि आनौं तौ राजा ॥ नींद न लीन्ह, रैनि […]

राजा-रत्न-सेन-वैकुंठवास-खंड-56 पद्मावत/जायसी

तौ लही साँस पेट महँ अही । जौ लहि दसा जीउ कै रही ॥ काल आइ देखराई साँटी । उठी जिउ चला छोड़िं कै माटी ॥ काकर लोग, कुटुँब, घर बारू । काकर अरथ दरब संसारू ॥ ओही घरी सब भएउ परावा । आपन सोइ जो परसा, खावा ॥ अहे जे हितू साथ के नेगी […]

पद्मावती-नागमती-सती-खंड-57 पद्मावत/जायसी

पदमावति पुनि पहिरि पटोरी । चली साथ पिउ के होइ जोरी ॥ सूरुज छपा, रैनि होइ गई । पूनो-ससि सो अमावस भई ॥ छोरे केस, मोति लर छूटीं । जानहुँ रैनि नखत सब टूटीं ॥ सेंदुर परा जो सीस अघारा । आगि लागि चह जग अँधियारा ॥ यही दिवस हौं चाहति, नाहा । चलौं साथ, […]

उपसंहार-58 पद्मावत/जायसी

मैं एहि अरथ पंडितन्ह बूझा । कहा कि हम्ह किछु और न सूझा ॥ चौदह भुवन जो तर उपराहीं । ते सब मानुष के घट माहीं ॥ तन चितउर, मन राजा कीन्हा । हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा ॥ गुरू सुआ जेइ पंथ देखावा । बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा?॥ नागमती यह दुनिया-धंधा । […]

दोहे/रैदास

ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।1 करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस। कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।।2 कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।3 कह रैदास […]

दोहे/कबीर

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय॥१॥ तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय । कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय॥२॥ माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर॥३॥ […]

बाहर पहरा ज्ञान का ,भीतर हरि का वास/दिलजीत सिंह रील

पांव चूम पगडंडियां ,सब को रहीं नवाज़ । जहां कहीं जाती नहीं, सड़कें दूर दराज।। सरल हृदय पगडंडियां, करें पथिक से प्रीत । मंजिल तक पहुंचाएंगी ,बढे चलो दिलजीत।। पापी धर्मी कौन है, भेद न मन में लाए । पगडंडी सद् भाव से, सब का बोझ उठाए।। रमी चरण रज साधु की, पगडंडी के भाल […]

वो आने का वादा कर के ना आई तमाम रात/दिलजीत सिंह रील

वो आने का वादा कर के ना आई तमाम रात । हर आहट पे दर पे आंखें बिछाई तमाम रात।। ये आसमां के चांद तारे हैं साथ मेरे फिर भी । कटती नहीं है काटे ये तन्हाई तमाम रात ।। कुछ लोगों ने अब तो उस में स्टीमर चला दिए हैं। जो रो रो के […]

जगत रेल में चल रहे, भांति भांति के लोग/दिलजीत सिंह रील

खींचे इंजिन राम का, चले जगत की रेल। लाख चुरासी सीट की,कस कर रखे नकेल।। जगत रेल में चल रहे, भांति भांति के लोग। जैसा भाड़ा कोच का, वैसी सुविधा भोग।। चलता इंजिन ऐकला, आपस में कर मेल । डिब्बा डिब्बा जोड़ कर, सरपट दौड़े रेल ।। रेल पटरियों पर चले, जीवन भी इक रेल। […]

बस कुछ दिन और बरस जाए/दिलजीत सिंह रील

यह माना बहुत गिरा है पानी स्थिति भयावह बन जाएगी । बस कुछ दिन और बरस जाए तो अपनी कोठी तन जाएगी ।। दमित नदी की धारा को अब तक घाटों ने बांध रखा था । उफनी बाढ़ यदि इस बारिश में घाट नदी में ठन जाएगी ।। इतना पानी बरसा फिर भी नेता हुए […]