धरोहर

गीत व्यंग्य लय गज़ल गयी/दिलजीत सिंह रील

कितने सारे यार गये । हमको जिन्दा मार गये ।। यार गये जां वार गये । सुख के सब आधार गये।। बसे हुए थे आंखों में । सपनों के संसार गये ।। डोरी थामें रिश्तों की । सारे रिश्ते हार गये ।। प्राणों के कोषालय से । जीवन के उपहार गये ।। वे सब महा […]

गाड़ी हांकों भैयाजी हमने इसमें/दिलजीत सिंह रील

तन का पर्वत मन का सागर रक्खा है । गिरवी रक्षित हाथों में घर रक्खा है ।। कच्चे मटके फूट रहे हैं विश्वासों के । सोणी का विश्वास जहां पर रक्खा है ।। अच्छे दिन का सपना फैंका था, हमने । वो ही सपना आंखों में भर रक्खा है ।। हम जुटे हुए हैं अपना […]

जब अंधेरे हम कर सके ना प्यार से रौशन/दिलजीत सिंह रील

हम किये थे जिनके हवाले बाग को साहिब । दीमकें चाट गईं उन्हीं दिमाग को साहिब।। कदम हमने,अब हैं बढ़ाए,चांद की जानिब । मुफलिसी ये,कब तक सुनेगी राग को साहिब।‌। जब अंधेरे हम कर सके ना प्यार से रौशन। क्या करेंगे, ऐसी सुलगती आग को साहिब।। गिद्ध की ही तरहा, गड़ी है आंख दुश्मन की। […]

नदी है वोट की गन्दी हमें उस पार जाना है/दिलजीत सिंह रील

वही बादल चले हैं क्यों गिराने बिजलियां लेकर । हताशा में खड़े हम राहतों की तख्तियां लेकर ।। नदी है वोट की गन्दी हमें उस पार जाना है । अभी ठहरो न जाओ छेद वाली कश्तियां लेकर।। यहां आई गरीबी, आफतों की आंधियां बनकर । वहां वो पी रहे हैं चाय काफी चुस्कियां लेकर ।। […]

करों को चुकाने यार नंगे हो गये/दिलजीत सिंह रील

हम किसी को जिता के बदनाम हो गये । वो जीते क्या चुनाव गुम नाम हो गये।। हम तमाशा दूर से ही देखते रहे । वो गुलों को चुरा के गुलफाम हो गये।। सड़कों पर अपनी उनसे नज़र क्या मिली। दिलों के धड़कते वाहन जाम हो गये।। करों को चुकाने यार नंगे हो गये। दो […]

जो बाप हमारे हैं जी/दिलजीत सिंह रील

जो बाप हमारे हैं जी । वो पाप हमारे हैं जी ।। जो कुर्सी पर हैं बैठे । पद-चाप हमारे हैं जी।। मक्कार फरेबी नेता । संताप हमारे हैं जी ।। है वीर भगत की रस्सी। पर नाप हमारे हैं जी ।। आज़ाद तिरंगे पर भी । शुभ-छाप हमारे हैं जी ।। जो नभ पर […]

दी है गम ने धमकी तब से ही/दिलजीत सिंह रील

बहते पानी पर नाम लिखा है । यह जीवन का अंजाम लिखा है ।। बलि कितने ही तारे चढ़ जाते । सुबहो को मैंने शाम लिखा है ।। तख्ती पर हमने ही कर्मों के । दण्डों का वाजिब काम लिखा है।। दी है गम ने धमकी तब से ही । है दर्दों से आराम लिखा […]

तट पर मोती मिल जायें/दिलजीत सिंह रील

जिसका जीना मरना क्या । उसकी बातें करना क्या।। मान नहीं सम्मान नहीं । पांव वहां पर धरना क्या ।। यदि दर्पण देख सका ना। सजना और संवरना क्या।। तट पर मोती मिल जायें । सागर बीच उतरना क्या।। जग में जय जय कार हुई । ताप किसी का हरना क्या।। कर्मों का फल मिलता […]

जब से यारों की मंदी है/दिलजीत सिंह रील

जब से यारों की मंदी है । शुक्र-गुजारों की मंदी है।। टूट रहे रिश्तों के बन्धन । सद् व्यवहारों की मंदी है।। लाठी ही एक सहारा है । बरखुरदारों की मंदी है।। सूरज -सूरज गृहण लगा है नव-उजियारों की मंदी है।। साकार करें जो सपनों को। उन अय्यारों की मंदी है।। सड़कें नाप रहे व्यापारी […]

तुम क्या जानों भूख उदर की/दिलजीत सिंह रील

समझ खिलौना बेच दिया है । सपन सलौना बेच दिया है ।। कुछ ने तो अपना ऊंचापन । बन कर बौना बेच दिया है।। तुम क्या जानों भूख उदर की। सुमन बिछौना बेच दिया है।। अब पंगत क्या बिठलायेगा। पत्तल दौना बेच दिया है।। गम की मारी रुदाली ने। रोना धोना बेच दिया है‌‌।। आज़ादी […]