हरसिंगार खिले जब आँगन, मेरे पास चले आना तुम
मन हो जाए सुरभित उपवन, मेरे पास चले आना तुम
मन की तख़्ती पर जब कोई, लिखता जाए हौले-हौले
यादों का लेखन प्रतिलेखन,मेरे पास चले आना तुम
दुनियादारी की सब बातें, बार-बार समझाने पर भी
बात नहीं माने जब ये मन, मेरे पास चले आने तुम
कोयल की जब एक कूक का, नदिया-नदिया, पर्वत-पर्वत
जंगल-जंगल हो आवर्तन, मेरे पास चले आना तुम
भूल न पाए इक पल को भी, जब-जब प्यासा आकुल अंतर
अपनेपन में डूबा सावन, मेरे पास चले आना तुम
छँट जाएँ सब धूमिल परतें,शिकवे और शिकायत की जब
मन हो जाए निर्मल दरपन, मेरे पास चले आना तुम
प्रेम ही जिसका पावन मंदिर, प्रेम ही जिसका अर्चन-वंदन
याद कभी आए इक जोगन, मेरे पास चले आना तुम
मेरे पास चले आना तुम/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय
