मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी
कभी ग़ज़लों में बोलूँगी, कभी नज़्मों में बोलूँगी
तुम्हारे शोर में भी बेसुरे होंगे न मेरे स्वर
यहाँ जब-जब भी बोलूँगी मैं सुर-तालों में बोलूँगी
समय सुन, इक नज़र पैनी-सी मेरी भी टिकी तुझ पर
मैं चुप रह भी गई तो सच इन्हीं ग़ज़लों में बोलूँगी
बहाकर ले गई गर ये लहर अपने तरन्नुम में
मैं पायल की थिरकती सुरमयी तालों में बोलूँगी
फिर इक दिन मौन हो जाएगी ये आवाज़ भी मेरी
कहीं फिर गीत या ग़ज़लों के कुछ पन्नों में बोलूँगी
मैं सदियों से अँधेरों में घिरी हूँ, हाँ मगर फिर भी
सहर होने पे सूरज की इन्हीं किरणों में बोलूँगी
हैं ये दुख-दर्द तो सबके, समेटे हैं जो लफ़्ज़ों में
जो चेहरा मिट गया मेरा, सभी चेहरों में बोलूँगी
मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय
