मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय
मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी कभी ग़ज़लों में बोलूँगी, कभी नज़्मों में बोलूँगी तुम्हारे शोर में भी बेसुरे होंगे न मेरे स्वर यहाँ जब-जब भी बोलूँगी मैं सुर-तालों में बोलूँगी समय सुन, इक नज़र पैनी-सी मेरी भी टिकी तुझ पर मैं चुप रह भी गई तो सच इन्हीं ग़ज़लों में […]
