ग़ज़ल

मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

मैं इक फ़नकार हूँ, फ़न के नए लफ़्ज़ों में बोलूँगी कभी ग़ज़लों में बोलूँगी, कभी नज़्मों में बोलूँगी तुम्हारे शोर में भी बेसुरे होंगे न मेरे स्वर यहाँ जब-जब भी बोलूँगी मैं सुर-तालों में बोलूँगी समय सुन, इक नज़र पैनी-सी मेरी भी टिकी तुझ पर मैं चुप रह भी गई तो सच इन्हीं ग़ज़लों में […]

धरा तो बाँट लेंगे पर ख़ुशी क्या बाँट पाएँगे/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

धरा तो बाँट लेंगे पर ख़ुशी क्या बाँट पाएँगे हवा, सूरज वो चँदा-चाँदनी क्या बाँट पाएँगे तुले हैं जो सियाही-लेखनी को बाँटने पल-पल बताओ वाग्देवी-भारती क्या बाँट पाएँगे उन्हें तो चाहिए बस आसमाँ बैठे बिठाए ही मगर प्रतिभा, हुनर की ताज़गी क्या बाँट पाएँगे है जिनकी ज़िंदगी ख़ंजर, ये तलवारें, ये हत्याएँ कभी वो ज़िन्दगी […]

इक दवा हो गई प्रेम की वो गली/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

इक दवा हो गई प्रेम की वो गली इक दुआ हो गई प्रेम की वो गली उसका टकराना हर दिन उसी मोड़ पर इक बला हो गई प्रेम की वो गली पास आता गया वो मेरे दिल के जब सिलसिला हो गई प्रेम की वो गली उसके चेहरे में जैसे ख़ुदा बस गया फिर ख़ुदा […]

ज़िंदगी से प्यार है तो युद्ध क्यों/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

ज़िंदगी से प्यार है तो युद्ध क्यों प्यार ही उपचार है तो युद्ध क्यों कुछ नहीं मालूम कल क्या हो यहाँ जब क्षणिक संसार है तो युद्ध क्यों कौनसा मसला हुआ हल युद्ध से बात ये स्वीकार है तो युद्ध क्यों सरफिरों के हाथ से तलवार लो अपना घर-परिवार है तो युद्ध क्यों हर दिशा […]

रूह का शृंगार है उसने कहा था/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

रूह का शृंगार है उसने कहा था प्यार तो बस प्यार है उसने कहा था आसमाँ पर इक नज़र अपनी टिकाकर प्रेम तो उपहार है उसने कहा था प्रेम-गलियों के झरोखों से निकलकर दिल बहुत लाचार है उसने कहा था आरती के बीच में ये दीप भी अब कर रहा मनुहार है उसने कहा था […]

जग में हिंदुस्तान का सम्मान वंदेमातरम/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

जग में हिंदुस्तान का सम्मान वंदेमातरम इस धरा की यशकथा, यशगान वंदेमातरम रूपसी-सुखदायनी-मृदुभाषिनी-वरदायिनी भारती की इक सुरीली तान वंदेमातरम मंत्र ऐसा जिसने वीरों का बढ़ाया हौसला देश की आज़ादी की पहचान वंदे मातरम स्वर्ग से बढ़कर है माटी जिसकी रज में हम पले है उसी माँ भारती का गान वंदेमातरम है उपज उस लेखनी की […]

सुनहरे फूल के मानिंद हम भी मुस्कुराएँगे/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

सुनहरे फूल के मानिंद हम भी मुस्कुराएँगे नए इस साल में फिर से नए सपने सजाएँगे दिसम्बर जा रहे हो तुम नया ये साल तो देकर पुराने ज़ख्म इस दिल के मगर कैसे भुलाएँगे जो देती ही रहीं दिल को बहुत ही टीस रहरहकर वो माँझी की सभी ग़ज़लें नहीं अब गुनगुनाएँगे सबक़ जो दे […]

ठेस लग जाती है दिल को/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

अपने ही जब दिल दुखाएँ, ठेस लग जाती है दिल को और फिर दूरी बढ़ाएँ, ठेस लग जाती है दिल को ख़ुशबुएँ दिल में बसातीं तितलियों की राह में जब फूल ही काँटें बिछाएँ, ठेस लग जाती है दिल को आसमाँ छूने की ख़ातिर जब अदब के रास्ते ही एक दूजे को गिराएँ, ठेस लग […]

मेरे पास चले आना तुम/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

हरसिंगार खिले जब आँगन, मेरे पास चले आना तुम मन हो जाए सुरभित उपवन, मेरे पास चले आना तुम मन की तख़्ती पर जब कोई, लिखता जाए हौले-हौले यादों का लेखन प्रतिलेखन,मेरे पास चले आना तुम दुनियादारी की सब बातें, बार-बार समझाने पर भी बात नहीं माने जब ये मन, मेरे पास चले आने तुम […]

हो गई ख़ुद में फ़ना तो मैं ग़ज़ल कहने लगी/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

हो गई ख़ुद में फ़ना तो मैं ग़ज़ल कहने लगी मिल गई उसकी दुआ तो मैं ग़ज़ल कहने लगी आसमाँ से पूछती थी रात-दिन वो है कहाँ जब चला उसका पता तो मैं ग़ज़ल कहने लगी नाचने ही लग गई थी मौत मेरे सामने खो गया हर रास्ता तो मैं ग़ज़ल कहने लगी हाथ में […]