ग़ज़ल

परायों से भी करता प्यार जो जी जान से बढ़कर/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

परायों से भी करता प्यार जो जी जान से बढ़कर नहीं दुनिया में कोई देश हिंदुस्तान से बढ़कर उन्हीं के ही तो वंशज हैं वचन के जो रहे पक्के रहा कुछ भी नहीं जिनके लिए सम्मान से बढ़कर अरे अब रोक भी दो मौत के मंज़र ये बंदूकें कहाँ माँ-बाप को कुछ क़ीमती सन्तान से […]

वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो नियम-संयमन को ही विस्तार दे दो, रहा है जो शाश्वत, वो व्यवहार दे दो जहाँ ने भी सदियों से हमको पुकारा, हमें ही विचारा, हमें ही उचारा मगर वो घटाएँ कहीं खो गई हैं, वो पहली-सी बारिश के आसार दे दो […]

सुनो ऐ चाँद पूनम के/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

उसे अब ढूँढ कर लाना, सुनो ऐ चाँद पूनम के ये दिल जिसका है दीवाना, सुनो ऐ चाँद पूनम के रहे रूठा मगर यादों में आकर क्यों सताता है ये उससे पूछ कर आना, सुनो ऐ चाँद पूनम के उसे भी प्रेम के धागों पे क्या विश्वास है पूरा नज़र उसकी भी पढ़ आना, सुनो […]

मुझसे अब तुम लाड़ लड़ाने मत आना/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

मुझसे अब तुम लाड़ लड़ाने मत आना बेमतलब का प्यार जताने मत आना राम-कृष्ण आदर्श हैं मेरे जीवन के झूठी-मूठी प्रीत बढ़ाने मत आना मीरा के भजनों की मैं दीवानी हूँ तुम अपने ही गीत सुनाने मत आना मेरे जीवन का इक मकसद-मंज़िल है मेरी राहों को भटकाने मत आना रिश्तों की गर थाह नहीं […]

वो इक मसला ही सालों साल है जब/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

वो इक मसला ही सालों साल है जब नहीं हाथों में रोटीदाल है जब अकालों में ही मर जाएगा होरी नज़र बादल की फिर से लाल है जब बढ़ेगी रोज़ ही बेरोजगारी सियासत की ही गहरी चाल है जब यहाँ के बाग में क्या फूल होंगे यहाँ सड़कों का ऐसा हाल है जब बता कैसे […]

दीप बनकर हर घड़ी लड़ती रही/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

चाँद, सूरज, दीप बनकर हर घड़ी लड़ती रही इन अँधेरों से सदा ये रोशनी लड़ती रही पर्वतों का, घाटियों का, साथ तो छूटा मगर सागरों के पास जाने तक नदी लड़ती रही दर्द तो देकर गए सच्चाइयों के रास्ते झूठ से फिर भी पिता की सादगी लड़ती रही पर उसे मिल ही न पाई एक […]

कभी तुम चाय पर आना/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

वही फिर गीत गाएँगे, कभी तुम चाय पर आना वो सरगम गुनगुनाएँगे, कभी तुम चाय पर आना तराने झूमते गाते थे पलपल देखकर तुमको उन्हें फिर से उठाएँगे, कभी तुम चाय पर आना वो स्वर्णिम पल कहाँ फिर लौटकर वापस ही आएँगे चलो यादें सजाएँगे, कभी तुम चाय पर आना कोई शिकवा कहीं तुम दिल […]

उड़ा रहा है ये कौन मुझको/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

सपन सुनहरे सजा-सजाकर, दिखा रहा है ये कौन मुझको सजीले पंखों पे आसमाँ रख, उड़ा रहा है ये कौन मुझको खनकती पायल, चमकते कंगन, ये कौन लाया मेरे लिए सब सितारों की झिलमिलाती चूनर, उढ़ा रहा है ये कौन मुझको न दिल ही अपना, न धड़कनें ही, रमा हुआ है वही रगों में मेरी ही […]

वो अनपढ़ गाँव की लड़की/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

मुझे कितना लुभाती है, वो अनपढ़ गाँव की लड़की मेरा दिल जीत जाती है, वो अनपढ़ गाँव की लड़की हैं उसके पास कितनी, गाँव-घर-परिवार की बातें मुझे इक-इक सुनाती है, वो अनपढ़ गाँव की लड़की बचा है अब कहाँ वो गाँव में गाँवों का भोलापन कसक दिल की उठाती है, वो अनपढ़ गाँव की लड़की […]

धरोहर गाँव की हमको/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

धरोहर गाँव की हमको, कभी दिखलाओ तो होरी तुम्हारे खेत-खलिहानों, से फिर मिलवाओ तो होरी तुम्हारे गाँव के आँगन, कहाँ तक मुस्कुराते हैं हमें उस मुस्कुराहट की, झलक दिखलाओ तो होरी ज़मीदारी नहीं फिर भी, गरीबी आज उतनी ही लिए जाता है ख़ुशियाँ कौन, ये समझाओ तो होरी नई पीढ़ी लगाती क्यों नहीं अब ध्यान […]