सपन सुनहरे सजा-सजाकर, दिखा रहा है ये कौन मुझको
सजीले पंखों पे आसमाँ रख, उड़ा रहा है ये कौन मुझको
खनकती पायल, चमकते कंगन, ये कौन लाया मेरे लिए सब
सितारों की झिलमिलाती चूनर, उढ़ा रहा है ये कौन मुझको
न दिल ही अपना, न धड़कनें ही, रमा हुआ है वही रगों में
मेरी ही साँसों की साँस बनकर, जिला रहा है ये कौन मुझको
ये ताल कैसी, ये कैसी सरगम, ये कैसी तानों का सिलसिला है
हर एक पल में, नई-सी धुन पर, नचा रहा है, ये कौन मुझको,
उबर रही हूँ मैं हौले-हौले गहन उदासी की रात से अब
सुनहरी शीतल-सी रोशनी बन जगा रहा है ये कौन मुझको
नज़र मेरी अब जहाँ भी जाए, उसी के रंगों का नूर देखूँ
उसी की तो गहरी छाप हूँ मैं, बता रहा है ये कौन मुझको
ये फेर कैसा जनम-जनम का, कभी यहाँ पग कभी वहाँ पग
युगों-युगों से बदल के माटी, बना रहा है ये कौन मुझको
