लगाता रोज़ मैं चहरा नया हूँ/ग़ज़ल/रचना निर्मल
लगाता रोज़ मैं चहरा नया हूँ तेरा ही ऐब हूँ तुझमें छिपा हूँ लड़ाई ख़ुद से ही लड़ता रहा हूँ बख़ूबी बात यह मैं जानता हूँ लगा है रोग सच्चाई का जब से दिखाती हर किसी को आइना हूँ जो बाँधे आपको ताउम्र मुझसे मुहब्बत का वही मैं दाइरा हूँँ जकड़ लेता है सबके ज़ह्न […]
