काव्य

दोस्त दोस्त ना रहा/गीत/शैलेन्द्र

दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा, ऐतबार ना रहा अमानतें मैं प्यार की गया था जिसको सौंप कर वो मेरे दोस्त तुम ही थे तुम्हीं तो थे जो ज़िंदगी की राह मे बने थे मेरे हमसफ़र वो मेरे दोस्त तुम ही थे तुम्हीं तो थे सारे भेद […]

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया/गीत/शैलेन्द्र

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया हे रामा!!!! उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया आरे!! बरफ़ी के सब रस ले लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया अ हे अ हे … हे रामा उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया आहा!!!! उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया आरे! कपड़ा के सब रस ले […]

सबकुछ सीखा हमने/गीत/शैलेन्द्र

सबकुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी सच है दुनियावालों के हम हैं अनाड़ी दुनिया ने कितना समझाया कौन है अपना कौन पराया फिर भी दिल की चोट छुपाकर हमने आपका दिल बहलाया ख़ुद ही मर मिटने की ये ज़िद है हमारी दिल का चमन उजडते देखा प्यार का रँग उतरते देखा हमने हर जीनेवाले को […]

जब गिला वो करें चुप रहा हम करें/ग़ज़ल/रचना निर्मल

जब गिला वो करें चुप रहा हम करें क़र्ज़ चाहत का ऐसे अदा हम करें वो करें बेवफ़ाई वफ़ा हम करें आप ही अब कहें और क्या हम करें कोई आ कर बता जाए इतना हमें कैसे  बेताब दिल की दवा हम करें चाहे दुनिया करे लाख ज़ुल्म-ओ-सितम दिल को दिल से न फिर भी […]

लगाता रोज़ मैं चहरा नया हूँ/ग़ज़ल/रचना निर्मल

लगाता रोज़ मैं चहरा नया हूँ तेरा ही ऐब हूँ तुझमें छिपा हूँ लड़ाई ख़ुद से ही लड़ता रहा हूँ बख़ूबी बात यह मैं जानता हूँ लगा है रोग सच्चाई का जब से दिखाती हर किसी को आइना हूँ जो बाँधे आपको ताउम्र मुझसे मुहब्बत का वही मैं दाइरा हूँँ जकड़ लेता है सबके ज़ह्न […]

आपकी आँखें हमारी राहत ए जाँ हो गईं/ग़ज़ल/रचना निर्मल

आपकी आँखें हमारी राहत ए जाँ हो गईं इनसे मिलकर दिल की सब शमएँ फरोज़ाँ हो गईं  आपकी नज़रों ने जब हमको शरारत से छुआ दिल की दीवारें महब्बत से निगाराँ हो गईं  मुश्किलों के दौर में मुझमें छिपीं कुछ सीरतें मौक़ा पाते ही जमाने पर नुमायाँ हों गईं जब नहीं पाया महब्बत का महब्बत […]

जिसकी ख़ातिर हार बैठी है/ग़ज़ल/रचना निर्मल

अपना सब कुछ जिसकी ख़ातिर हार बैठी है उसने क्या इक बार भी पूछा तू कैसी है  दिल परेशाँ है बहुत औ’र आँख भीगी है घर की रौनक़ जब से वीराने में बैठी है  आज भी अपने ही घर में नारी की हालत नौकरानी तो कभी गुलदान जैसी है रास्ता छोड़ा नहीं है मैंने हिम्मत […]

बुरा तो किसी को ये अच्छा लगा/ग़ज़ल/रचना निर्मल

बुरा तो किसी को ये अच्छा लगा घरौंदे में पत्थर जो सच का लगा  यहाँ इंतिज़ारी रही और वहाँ दिल उसका किसी और से जा लगा  सवालात हर सम्त उठने लगे मुझे सच का रस्ता जब अच्छा लगा शिकार उसके दिल का जो करना है तो तू तीर-ए-नज़र से निशाना लगा ख़ुदा की जिसे ज़ात […]

यूँ भी ख़ुद को आज़माते हम/ग़ज़ल/रचना निर्मल

शब ए फ़िराक़  यूँ भी ख़ुद को आज़माते हम न याद आपको करते न याद आते हम  शिकन न डालते माथे प मुस्कुराते हम वतीरा आपके दिल का समझ जो जाते हम नज़र मिला के महब्बत से गर वो करते बात बदल के वक़्त का हर दौर लौट आते हम  हमारे इश्क़ प उनको यक़ीन […]

हवाएँ उस तरफ़ तूफ़ान लाना चाहती हैं/ग़ज़ल/रचना निर्मल

हवाएँ उस तरफ़ तूफ़ान लाना चाहती हैं निगाहें जिस तरफ़ दुनिया बसाना चाहती हैं मिले ज़ख़्मों को हर सूरत भुलाना चाहती हैं ये आँखें लज़्ज़तें उल्फ़त की पाना चाहती हैं उस आँगन की बता दीवारों को अब क्या कहूँ मैं जो चोटें सह के भी रिश्ते निभाना चाहती हैं जो क़िस्मत के थपेड़ों ने किए […]