Year: 2025

यश मालवीय/गीत/मनोज जैन

बाद में बातें करूँगा आपसे, मैं अभी यश मालवीय को, पढ़ रहा हूँ। वाल क्या है आईना है, यह समय का, भरा पूरा एक दस्तावेज है। लोकधर्मी चेतना के, साथ में प्रतिरोध का, यह अकेला आधिकारिक पेज है। पेज पढ़ यश मालवीय का, मैं स्वयं को स्वयं में ही, गढ़ रहा हूँ। बाद में बातें […]

आज किसी से /गीत/मनोज जैन

आज किसी से मिलकर यह मन जी भर बतियाया। लगा कि जैसे हमने अपने ईश्वर को पाया। स्वप्न गगन में मन का पंछी, उड़ता चला गया। बतरस के अपनेपन से, मन जुड़ता चला गया। लगा कि जैसे किसी परी ने, गीत नया गाया। एक पहर में,कसम उठा ली, युग जी लेने की। पीड़ा का विष […]

सुख के दिन/गीत/मनोज जैन

सुख के दिन छोटे-छोटे से, दुख के बड़े-बड़े। सबके अपने-अपने सुख हैं, अपने-अपने दुखड़े। फीकी हँसी, हँसा करते हैं, सुन्दर-सुन्दर मुखड़े। रंक बना देते राजा को, दुर्दिन खड़े-खड़े। सुख के दिन छोटे-छोटे से, दुख के बड़े-बड़े। सबकी नियति अलग होती है, दिशा, दशा सब मन की। कोई यहाँ कुबेर किसी को, चिन्ता है बस धन […]

मेले में बच्चे/कविता/पल्लवी पाण्डेय

मेले में घूमते हुए मैंने देखा दुनिया के सबसे अमीर लोगों का चेहरा कुछ ने पकड़ी थी अपने बच्चों की उंगलियां कुछ कंधों पर सवार थे दुनिया के भाग्यशाली बच्चे समय और अत्यधिक श्रम बेवक्त बूढ़े लगते कुछ चेहरों के साथ चल रहे थे बढ़ते हुए बच्चे मेले में बिकती हर चीज को खरीदने , […]

रेहन पर खुशियाँ/कविता/पल्लवी पाण्डेय

  अचानक छूट जाता है मेरे हाथों से तुम्हारा हाथ सो जाते हो तुम घोर निद्रा में अचानक ही रुक जाती है तुम्हारी सांस एकदम से हमेशा के लिए मां चीख पड़ती है बहुत जोर से अचानक मैं दीदी को बुला रही फ़ोन पर चीख जगा रही तुम्हें पूरी ताकत के साथ पर मैं जगा […]

मेरी कविता में तुम/कविता/पल्लवी पाण्डेय

  मेरी कविता में जब तुम आते है , अक्षरों में आ जाती है नमी शब्दों में भर जाती है भावुकता , और पंक्तियों के मध्य प्रवाहित होने लगता है अतीत , जब भी मैं तुम पर लिखती हूं कोई कविता किसी अंजान राह राह पर अकेले जाते दिखती है इस लम्बी परछाई .. टेबल […]

भटकती नींद/कविता/पल्लवी पाण्डेय

किसी रात जब नींद भटकने लगती है अनिद्रा के जंगल में आंखों से कोसों दूर अंधेरी घनी रात में टिमटिमाते जगनुओं की जलती बुझती रोशनी के साथ उस रात उभरते हैं अतीत के दुःख –सुख कई किस्से बचपन के कुछ धुंधले चेहरे कुछ काली परछाइयां परीक्षा का कोई कठिन सवाल जिसका उत्तर अब पता हो […]

तुम पर लिखी कविता/कविता/पल्लवी पाण्डेय

  तुम्हारे जानें के बाद मैंने पीड़ा के सागर में गोते लगाकर कुछ शब्द चुने , स्मृतियों के घनी झाड़ियों से खोजी तुम्हारी यादों को सहेजने वाली औषधियां , कई रातें जाग –जागकर टिमटिमाते तारों में लगाया पता तुम्हारे सितारे का , घंटों बैठ घाट किनारे निहारती रही मणिकर्णिका से उठने वाली गंगा की लहरों […]

सफ़ेद सलवार/कविता/पल्लवी पाण्डेय

सफेद सूट सलवार पहन स्कूल ,कॉलेज जाती लडकियां महीने के चार –पांच दिन कितनी ही आशंकाओं से घिरी होती है पीरियड का दर्द सहते हुए भी हर वक्त एक चिंता दाग के लग जाने का , और वह दाग , किसी को दिख जाने का। कितना कठिन है उन दिनों निर्धारित सफेद परिधान पहनना घर […]

रिश्ते का मीठा छायादार वृक्ष/कविता/पल्लवी पाण्डेय

  बहुत लगन से बोया है मैंने हमारे रिश्ते का नन्हा बीज भरोसे की ज़मीन में । समय की खाद , सुख के दिनों की रोशनी और उदासियां भरे तपते दिनों में साथ होने की मीठी फुहार हमारे रिश्ते के नन्हें दरख़्त को एक दिन बना देगी जरूर घना छायादार वृक्ष .. जिसके मीठे फल […]