झूठों का संसार है बाबा/ग़ज़ल/दर्द गढ़वाली
झूठों का संसार है बाबा। सच कितना लाचार है बाबा।। इन्सां इन्सां से लड़ता है। ज़ेहन से बीमार है बाबा।। घर-घर में सब दीप जलाएं। इससे कब इनकार है बाबा।। द्रौपदी देखो फिर लुटती है। अंधों का दरबार है बाबा।। धर्म बताकर नंगा नाचें। समझाना बेकार है बाबा।। इश्क़-मुहब्बत तौबा-तौबा। […]
