छत से छत की मीठी बातें और अपनापन छीन लिया/ग़ज़ल/ए.एफ़. ’नज़र’
छत से छत की मीठी बातें और अपनापन छीन लिया, फ़्लैटों की तहज़ीब ने हमसे चौड़ा आँगन छीन लिया। शहर की रोशन गलियो तुमको अपना दुख क्या बतलाएँ, रोटी कर फ़िक्रों ने हमसे गाँव का सावन छीन लिया। रूखी-सूखी जो मिलती सब भाई बाँट के खाते थे, अहदे तरक़्क़ी ऐसा आया सब अपनापन छीन लिया। […]
