वैदेही वनवास सर्ग1-10/अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
प्रथम सर्ग उपवन छन्द: रोला लोक-रंजिनी उषा-सुन्दरी रंजन-रत थी। नभ-तल था अनुराग-रँगा आभा-निर्गत थी॥ धीरे-धीरे तिरोभूत तामस होता था। ज्योति-बीज प्राची-प्रदेश में दिव बोता था॥1॥ किरणों का आगमन देख ऊषा मुसकाई। मिले साटिका-लैस-टँकी लसिता बन पाई॥ अरुण-अंक से छटा छलक क्षिति-तल पर छाई। भृंग गान कर उठे विटप पर बजी बधाई॥2॥ दिन मणि निकले, किरण […]
