कला और बूढ़ा/सुमित्रानंदन पंत
बूढ़ा चाँद बूढ़ा चांद कला की गोरी बाहों में क्षण भर सोया है । यह अमृत कला है शोभा असि, वह बूढ़ा प्रहरी प्रेम की ढाल । हाथी दांत की स्वप्नों की मीनार सुलभ नहीं,- न सही । ओ बाहरी खोखली समते, नाग दंतों विष दंतों की खेती मत उगा। राख की ढेरी से ढंका […]
