कविता

लोकतंत्र/डॉ. शिप्रा मिश्रा

बिछ चुकी है बिसात अब फिर नए सिरे से, झोकेंगे अपनी समूची ताकत और सब खेलेंगे दिमाग़ से अपनी चाल अपनी पारी और मंगरुवा ऐसे ही चलाता रहेगा बिना थके चाय,नाश्ता,पान,सिगरेट,शराब बदले में मिल जाऍंगी कुछ फेंकी हुईं हड्डियाँ इन फेंकी,सूखी,चूसी हडि्ड्यों से ही तो सदियों से पोषित होती रही उसकी समूची बिरादरी और पैदा […]

वानप्रस्थ/डॉ. शिप्रा मिश्रा

चले गए सब चले गए जाने दो चले गए अच्छा हुआ चले गए क्या करना जो चले गए अब मैं आराम से खाऊँगी अपने हिस्से की रोटी पहले तो एक ही रोटी के हुआ करते थे कई-कई टुकड़े जाने दो चले गए बहुत अच्छा है चले गए उनके पोतड़े धोते- धोते घिस गईं थीं मेरी […]

आज भी/डॉ. शिप्रा मिश्रा

आज भी.. देखा मैंने उसे पानी में खालिश नमक डाल कर उसने मिटाई अपनी भूख आज भी– खाता है वह सिर्फ रात में ही कभी- कभी तो वह भी उसे होता नहीं नसीब आज भी– उसने जम के पसीने बहाए ढेर सारे और दिन भर की है ईमानदारी से मजूरी आज भी– मिलते हैं उसके […]

बिछिया/डॉ. शिप्रा मिश्रा

उस विवाह में हम भी हुए थे निमंत्रित भरपेट खाए थे भोज और.. मन भर मिठाईयांँ भी एक साड़ी, टिकुली, सेनूर, आलता भेंट भी कर आए थे और.. एक जोड़ी बिछिया भी.. कलेजे का टुकड़ा थी वह मेरी छात्रा नन्दिनी जन्मजात तेजस्विनी ऊर्जस्वित, निष्ठावान मृदुभाषी, सौम्य, शिष्ट उसकी मौन, मूक आँखों ने अनेक बार मेरे […]

तथागत/डॉ. शिप्रा मिश्रा

सभी पुरुष .. प्रवासी नहीं होते लेकिन सभी स्त्रियाँ होती हैं प्रवासी छोड़ जातीं हैं अपनी मिट्टी अपने लोग अपना गाँव- जवार लहलहाते खेत- खलिहान पोखर,अमराईयां, झूले बचपन की सखियाँ घर के आंगन में दबाये कुछ गिलट की अशर्फियां तुलसी चौरे पर छोड़ी हुई आस्था जनेऊ वाले पत्थर मौन महादेव भोर का सूर्योदय संध्या का […]

माँ/दया शर्मा

चूल्हे पे खाना बनाती थी, भर पेट सबको खिलाती थी , कभी स्वयं भूखी रह जाती थी । अपना दुख-दर्द छुपाती थी पर संस्कार का दीप जलाती थी, वो माँ हमारी कहलाती थी । पैसों की रहती तंगी थी , पापा के काम में मंदी थी । माँ शिकवा न कभी करती थी, थोड़े  में  […]

कोई तुमसा नहीं/दया शर्मा

यहाँ  आदमी तो बहुत हैं, पर इन्सान  कोई तुमसा नहीं । यहाँ  दोस्त तो बहुत हैं, पर मेहरबान कोई  तुमसा नहीं। ढूँढती फिरती थी नज़रें , किसी  रहनुमा की तलाश में कारवां तो मिल गया , पर हमनवां कोई तुमसा नहीं । यूँ  तो लगते थे सब अपने बेगानों की इस भीड़ में ऐतबार तो […]

बचपन/दया शर्मा

बचपन के वो हसीन पल क्षण क्षण क्यों  जाते हैं  ढल। ऐ दिल ! फिर  वहीं  पे चल वो मौसम  क्यों  गया  बदल । कभी हँसना, कभी  रोना कभी  रूँठना तो कभी  मनाना । वो पेड़ों पे चढ कर गिरना चोरी से फलों का खाना। वो कागज की नाव बनाना कभी  हवाई जहाज  चलाना खो […]

प्रकृति/दया शर्मा

प्रकृति करती ज्यों तो किसी का तिरस्कार  नहीं अत्याचार होता जब मानव का उस पर प्रतिशोध में  करती उसका वहिष्कार  यहीं । काश ! मनुष्य  तुम समझ  पाते बदौलत जिसके तुम  स्वस्थ्य  जीवन जीते, दमन  उसी का करने  पर तुलते क्यों दुःख दर्द के  आँसू पीते पेड़ पौधे  जो शुद्ध  हवा  देते उन्हीं को काट […]

वाणी/दया शर्मा

वाणी की महिमा  अपरम्पार है  । इसका अपना  अथाह संसार है। वाणी  दिलों में  चाहत भरती है। कभी ये ही दिलों  को आहत करती है वाणी  से रिश्ते संवरते हैं । कड़वे बोलों  से ये बिखरते  हैं। मीठी वाणी  लोगों  में  मान बढाती  । दुरुपयोग हो वाणी का तो ये समाज में  शान घटाती । […]