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पुस्तक समीक्षाःआसमान में कितने तारे (बालकविता–संग्रह, पृष्ठ-59, बालकविताएँ-51) 

पुस्तक समीक्षा आसमान में कितने तारे (बालकविता–संग्रह, पृष्ठ-59, बालकविताएँ-51) लेखक : वसंत जमशेदपुरी प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन मूल्य : ₹199 कविता : जीवन और बालमन का संस्कार कविता मनुष्य की अंतरात्मा का स्वर है—वह अदृश्य शब्द-सेतु जो मन, स्मृति और संवेदना को जोड़ता है। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण की प्रक्रिया है। साहित्य की […]

पुस्तक समीक्षाःथन का निष्कर्ष (कुण्डलियाँ–संग्रह, पृष्ठ-82, छंद-210) 

पुस्तक समीक्षा मंथन का निष्कर्ष (कुण्डलियाँ–संग्रह, पृष्ठ-82, छंद-210) लेखक : डॉ. बिपिन पाण्डेय प्रकाशक : शुभदा प्रकाशन मूल्य : ₹200 छंद काव्य का आत्मानुशासन और रस का दुर्लभ संतुलन है, जहाँ काव्यात्मक स्वतंत्रता नियमों के भीतर रहकर अधिक प्रभावशाली हो उठती है। वर्ण, मात्रा, यति, गति, तुक तथा चरणान्त की समानता से सुसज्जित छंद कविता […]

पुस्तकः बालमन की कुण्डलियाँ

  आज के समय में हम बच्चों से अच्छे व्यवहार, अनुशासन और संस्कारों की अपेक्षा तो करते हैं, किंतु विडंबना यह है कि उस व्यवहार के निर्माण हेतु आवश्यक मार्गदर्शन देना अक्सर भूल जाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे संवेदनशील, सहृदय और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण बनें, परंतु उन्हें वह साहित्य, वह वातावरण और […]

मेरे गाँव की चिनमुनकी/गीत/धीरज श्रीवास्तव

मीठे गीत प्रणय के गाकर और रात सपनों में आकर मुझको रोज छला करती है मेरे गाँव की चिनमुनकी । अक्सर कहकर मर जाऊँगी मुझको बहुत डराती है ! और ठान ले जो जिद अपनी मुझसे पाँव धराती है ! कभी – कभी रस खूब घोलकर और कभी वो झूठ बोलकर अक्सर बहुत कला करती […]

सँवरकी/गीत/धीरज श्रीवास्तव

आज अचानक हमें अचम्भित, सुबह-सुबह कर गयी सँवरकी। कफ़ ने जकड़ी ऐसे छाती, खाँस-खाँस मर गयी सँवरकी। जूठन धो-धोकर,खुद्दारी, बच्चे दो-दो पाल रही थी। विवश जरूरत जान बूझकर, बीमारी को टाल रही थी। कल ही की तो बात शाम को ठीक-ठाक घर गयी सँवरकी। लाचारी पी-पीकर काढ़ा ढाँढस रही बँधाती मन को। आशंकित थी, दीमक […]

कल्लू काका/गीत/धीरज श्रीवास्तव

चौराहे पर कल्लू काका। दिन भर मारें गप्प सड़ाका। घर में भूजी भाँग न बाकी भूखा पेट बहुत हठधर्मी। आलस पड़ा भरे खर्राटे गर्दन तक ओढ़े बेशर्मी। सैर स्वप्न में करें इरादे लन्दन पेरिस दुबई ढाका। चौराहे पर कल्लू काका। दिन भर मारें गप्प सड़ाका। उछल उछल लँगड़ी आशाएं दिखा रहीं फोकट में सर्कस। बीड़ी,जर्दा,चिलम,चुनौटी […]

फूट फूटकर अम्मा रोयीं/गीत/धीरज श्रीवास्तव

आँगन में दीवार पड़ गयी सन्नाटा है द्वारे पर। फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर। साँझ लगाती मरहम कैसे भला भूख के कूल्हे पर ! दुख की चढ़ी पतीली हो जब आशाओं के चूल्हे पर ! हमने ढलते आँसू देखे तुलसी के चौबारे पर। फूट फूटकर अम्मा रोयीं चाचा से बँटवारे पर। तनिक […]

रिक्शे वाले/गीत/धीरज श्रीवास्तव

फटे पाँव हाथों में छाले। मगर मस्त हैं रिक्शे वाले। रोज थिरकतीं मदहोशी में, सांझ ढले आशाएं भोली। स्वप्न अधूरे ठर्रा पीकर, नमक चाट कर करें ठिठोली। फुटपाथों पर नग्न गरीबी पड़ी अगौंछा मुँह पर डाले। सेंक रही है बैठ विवशता ईंटों के चूल्हे पर रोटी। प्यासा गला ढूंढता फिरता सड़क किनारे नल की टोटी। […]

चूमे प्रेम निशानी मन/गीत/धीरज श्रीवास्तव

तड़पे,सिसके,छुए निहारे चूमे प्रेम निशानी मन। लौट न पाता पास तुम्हारे किन्तु हठी,अभिमानी मन। किया हवा ने छल बादल से, चली छुड़ाकर हाथ अचानक। ठहर गया बढ़ सका न आगे, रहा अधूरा प्रेम कथानक। बुने उसी को साँझ सकारे, पल पल गढ़े कहानी मन। लौट न पाता पास तुम्हारे किन्तु हठी, अभिमानी मन। पलकों की […]

लिखकर गीत रात भर/गीत/धीरज श्रीवास्तव

अक्षर -अक्षर प्राण सँजोये लिखकर गीत रात भर रोये मतलब के सब रिश्ते नाते देख देखकर बस मुस्काते जकड़े बैठी हमें विवशता हम मुस्कान कहाँ से लाते कब बुनते नयनों में सपने? गुजरी उम्र न पल भर सोये लिखकर गीत रात भर– निठुर नियति के राग पुराने दुख बैठे हैं लिए बहाने किस किससे हम […]