वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

लेखक

  • डॉ. सीमा विजयवर्गीय
    शिक्षा-
    एम.ए. (हिंदी व संगीत),
    पी-एच.डी.-(राजस्थान वि.वि),
    बी.एड. शैक्षणिक,

    उपलब्धियाँ-पी-एच.डी.-हिंदी समास एक अध्ययन डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाओं के संदर्भ में।( व्याकरण)

    प्रकाशित कृतियाँ:
    1. ले चल अब उस पार कबीरा( ग़ज़ल-संग्रह, 2019)
    2. रज़ा भी उसी की ( ग़ज़ल-संग्रह,2020)
    3. तेरी ख़ुशबू मेरे अंदर ( ग़ज़ल-संग्रह, 2021)
    4. बुद्ध होना चाहती हूँ (ग़ज़ल-संग्रह, 2023)
    5. साक्षात्कार के बीच हिन्दी ग़ज़लकार (साक्षात्कार-संग्रह,
    2025)
    6. हिंदी ग़ज़ल में कृष्ण कुमार नाज़ का प्रदेय

    लेखन विधा: ग़ज़ल, गीत, दोहा, कविता, गद्य

    *विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित
    *अनेक राष्ट्रीय मंचों पर काव्यपाठ, दूरदर्शन, लोकसभा टीवी पर अनेक कार्यक्रम एवं मंचसंचालन

    View all posts

वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो
नियम-संयमन को ही विस्तार दे दो, रहा है जो शाश्वत, वो व्यवहार दे दो

जहाँ ने भी सदियों से हमको पुकारा, हमें ही विचारा, हमें ही उचारा
मगर वो घटाएँ कहीं खो गई हैं, वो पहली-सी बारिश के आसार दे दो

न मज़हब, न वर्णों, न भाषा के झगड़े, न नफ़रत, न रंजिश, न मिथ्या के पहरे
जहाँ प्यार ही प्यार हो मेरे राघव, मुझे ऐसी दुनिया का उपहार दे दो

ये संसार-सागर की गहरी है धारा, बहे जा रहे हैं न मिलता किनारा
लगे पार मेरी भी कश्ती यहाँ पर, मुझे राम सुमिरन की पतवार दे दो

न संगी, न बांधव, न रिश्ते न नाते, न अपने-पराए ही दुख के सहारे
जो प्राणों के रहते वचन को निभाते, वो सतयुग के पहले से किरदार दे दो

तुम्हीं मेरे बल हो, तुम्हीं जप हो मेरे, तुम्हीं साधना हो, तुम्हीं तप हो मेरे
मैं हर इक जनम में तुम्हें ही पुकारुँ, मुझे मेरे रघुवर, ये अधिकार दे दो

अमा की निशा के हैं सूरज निराले, कतारों में दीपक लगें प्यारे-प्यारे
दिवाली पे मेरा भी शृंगार कर दो, उजालों का उज्ज्वल मुझे हार दे दो

वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो/ग़ज़ल/डॉ. सीमा विजयवर्गीय

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *