वो सतयुग की शैली, वो आचार दे दो, हमें राम पहले-सा, संसार दे दो
नियम-संयमन को ही विस्तार दे दो, रहा है जो शाश्वत, वो व्यवहार दे दो
जहाँ ने भी सदियों से हमको पुकारा, हमें ही विचारा, हमें ही उचारा
मगर वो घटाएँ कहीं खो गई हैं, वो पहली-सी बारिश के आसार दे दो
न मज़हब, न वर्णों, न भाषा के झगड़े, न नफ़रत, न रंजिश, न मिथ्या के पहरे
जहाँ प्यार ही प्यार हो मेरे राघव, मुझे ऐसी दुनिया का उपहार दे दो
ये संसार-सागर की गहरी है धारा, बहे जा रहे हैं न मिलता किनारा
लगे पार मेरी भी कश्ती यहाँ पर, मुझे राम सुमिरन की पतवार दे दो
न संगी, न बांधव, न रिश्ते न नाते, न अपने-पराए ही दुख के सहारे
जो प्राणों के रहते वचन को निभाते, वो सतयुग के पहले से किरदार दे दो
तुम्हीं मेरे बल हो, तुम्हीं जप हो मेरे, तुम्हीं साधना हो, तुम्हीं तप हो मेरे
मैं हर इक जनम में तुम्हें ही पुकारुँ, मुझे मेरे रघुवर, ये अधिकार दे दो
अमा की निशा के हैं सूरज निराले, कतारों में दीपक लगें प्यारे-प्यारे
दिवाली पे मेरा भी शृंगार कर दो, उजालों का उज्ज्वल मुझे हार दे दो
