धरोहर

साकेत षष्ठ सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

तुलसी, यह दास कृतार्थ तभी- मुँह में हो चाहे स्वर्ण न भी, पर एक तुम्हारा पत्र रहे, जो निज मानस-कवि-कथा कहे। उपमे, यह है साकेत यहाँ, पर सौख्य, शान्ति, सौभाग्य कहाँ? इसके वे तीनों चले गये, अनुगामी पुरजन छले गये। पुरदेवी-सी यह कौन पड़ी? उर्मिला मूर्च्छिता मौन पड़ी। किन तीक्ष्ण करों से छिन्न हुई- यह […]

साकेत सप्तम सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

’स्वप्न’ किसका देखकर सविलास कर रही है कवि-कला कल-हास? और ’प्रतिमा’ भेट किसकी भास, भर रही है वह करुण-निःश्वास? छिन्न भी है, भिन्न भी है, हाय! क्यों न रोवे लेखनी निरुपाय? क्यों न भर आँसू बहावे नित्य? सींच करुणे, सरस रख साहित्य! जान कर क्या शून्य निज साकेत, लौट आये राम अनुज-समेत? या उन्हीं के […]

साकेत अष्ठम सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

चल, चपल कलम, निज चित्रकूट चल देखें, प्रभु-चरण-चिन्ह पर सफल भाल-लिपि लेखें। सम्प्रति साकेत-समाज वहीं है सारा, सर्वत्र हमारे संग स्वदेश हमारा। तरु-तले विराजे हुए,-शिला के ऊपर, कुछ टिके,-घनुष की कोटि टेक कर भू पर, निज लक्ष-सिद्धि-सी, तनिक घूमकर तिरछे, जो सींच रहीं थी पर्णकुटी के बिरछे, उन सीता को, निज मूर्तिमती माया को, प्रणयप्राणा […]

साकेत नवम सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

दो वंशों में प्रकट करके पावनी लोक-लीला, सौ पुत्रों से अधिक जिनकी पुत्रियाँ पूतशीला; त्यागी भी हैं शरण जिनके, जो अनासक्त गेही, राजा-योगी जय जनक वे पुण्यदेही, विदेही। विफल जीवन व्यर्थ बहा, बहा, सरस दो पद भी न हुए हहा! कठिन है कविते, तव-भूमि ही। पर यहाँ श्रम भी सुख-सा रहा। करुणे, क्यों रोती है? […]

साकेत दशम सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

चिरकाल रसाल ही रहा जिस भावज्ञ कवीन्द्र का कहा, जय हो उस कालिदास की- कविता-केलि-कला-विलास की! रजनी! उस पार कोक है; हत कोकी इस पार, शोक है! शत सारव वीचियाँ वहाँ मिलते हा-रव बीच में जहाँ! लहरें उठतीं, लथेड़तीं, धर नीचे कितना थपेड़तीं, पर ऊपर, एक चाल से, स्थित नक्षत्र अदृष्ट-जाल-से! तम में क्षिति-लोक लुप्त […]

साकेत एकादश सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

जयति कपिध्वज के कृपालु कवि, वेद-पुराण-विधाता व्यास; जिनके अमरगिराश्रित हैं सब धर्म, नीति, दर्शन, इतिहास! बरसें बीत गईं, पर अब भी है साकेत पुरी में रात, तदपि रात चाहै जितनी हो, उसके पीछे एक प्रभात। ग्रास हुआ आकाश, भूमि क्या, बचा कौन अँधियारे से? फूट उसी के तनु से निकले तारे कच्चे पारे-से! विकच व्योम-विटपी […]

साकेत द्वादश सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त

ढाल लेखनी, सफल अन्त में मसि भी तेरी, तनिक और हो जाय असित यह निशा अँधेरी। ठहर तमी, कृष्णाभिसारिके, कण्टक, कढ़ जा, बढ़ संजीवनि, आज मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा! झलको, झलमल भाल-रत्न, हम सबके झलको, हे नक्षत्र, सुधार्द्र-बिन्दु तुम, छलको छलको। करो श्वास-संचार वायु, बढ़ चलो निशा में, जीवन का जय-केतु अरुण हो […]

जयद्रथ वध/मैथिलीशरण गुप्त

प्रथम सर्ग वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो, फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो। दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो, होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो॥ अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है; न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड […]

नहुष/मैथिलीशरण गुप्त

1. मंगलाचरण क्योंकर हो मेरे मन मानिक की रक्षा ओह! मार्ग के लुटेरे-काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह । किन्तु मैं बढ़ूँगा राम,- लेकर तुम्हारा नाम । रक्खो बस तात, तुम थोड़ी क्षमा, थोड़ा छोह । 2. शची मणिमय बालुका के तट-पट खोल के, क्या क्या कल वाक्य नैश निर्जन बोल के । श्रान्त सुर-सरिता समीर […]

पंचवटी/मैथिलीशरण गुप्त

पूर्वाभास 1. पूज्य पिता के सहज सत्य पर, वार सुधाम, धरा, धन को, चले राम, सीता भी उनके, पीछे चलीं गहन वन को। उनके पीछे भी लक्ष्मण थे, कहा राम ने कि “तुम कहाँ?” विनत वदन से उत्तर पाया—”तुम मेरे सर्वस्व जहाँ॥” 2. सीता बोलीं कि “ये पिता की, आज्ञा से सब छोड़ चले, पर […]