साकेत षष्ठ सर्ग/मैथिलीशरण गुप्त
तुलसी, यह दास कृतार्थ तभी- मुँह में हो चाहे स्वर्ण न भी, पर एक तुम्हारा पत्र रहे, जो निज मानस-कवि-कथा कहे। उपमे, यह है साकेत यहाँ, पर सौख्य, शान्ति, सौभाग्य कहाँ? इसके वे तीनों चले गये, अनुगामी पुरजन छले गये। पुरदेवी-सी यह कौन पड़ी? उर्मिला मूर्च्छिता मौन पड़ी। किन तीक्ष्ण करों से छिन्न हुई- यह […]
