ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल/कविता/अमीर खुसरो
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियां । कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, न लेहो काहे लगाये छतियां । शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह, सखि पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां । यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं, किसे पडी है […]
