कहानी

नमक का दारोगा/मुंशी प्रेमचंद

जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। […]

दुनिया का सबसे अनमोल रतन/मुंशी प्रेमचंद

दिलफिगार एक कँटीले पेड़ के नीचे दामन चाक किये बैठा हुआ खून के आँसू बहा रहा था। वह सौन्दर्य की देवी यानी मलका दिलफरेब का सच्चा और जान-देनेवाला प्रेमी था। उन प्रेमियों में वही जो इत्र-फुलेल में बसकर और शानदार कपड़ों से सजकर आशिक के वेग में माशूकियत का दम भरते हैं। बल्कि उन सीधे-सादे […]

कम हो गया है/देवेंद्र जेठवानी

दफ़्तर वाला काम मेरे पास, आजकल कम हो गया है, मेरा यश, मेरा नाम, आजकल कम हो गया है, मेरी जेब में रूपया-पैसा, आजकल कम हो गया है, यार, दोस्तों से बोलचाल, आजकल कम हो गया है, विजेताओं में मेरा नाम, आजकल कम हो गया है, मिलने वाला मान-सम्मान, आजकल कम हो गया है, मेरी […]

प्रोफेसर का ट्यूशन/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

प्रोफेसर मुदित कुमार को काॅलेज में बहुत मान-सम्मान किया जाता है। विश्वविद्यालय स्तर से कई बार सर्वश्रेष्ठ प्रोफेसर के रूप में सम्मानित हो चुके हैं राज्य सरकार ने शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर राज्य के ख्यातिलब्ध शिक्षकों और प्रोफेसरों को एक लाख रुपये और अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया था। जिसमें तीन प्रोफेसरों का […]

पुत्र की चाह/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

बेणी प्रसाद चार पुत्री का पिता बन गया। पुत्र की चाह में गाँव के एक आदमी के कहने पर एक बाबा के पास पत्नी फूलमनी के साथ चला जाता है। बाबा को बेणी प्रसाद अपनी समस्या बता दी। बाबा इतराकर कहा, ‘‘अरे बेटा! तुमने बहुत देर कर दी। एक पुत्री के बाद ही मेरे पास […]

मैं डायन नहीं हूँ/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

चमेली का पति घर से पैदल निकला। सवारी बस से शहर इलाज कराने चला गया। साथ में चमेली भी गयी। दो दिन के बाद गाड़ी में उनका लाश आया। पति के अचानक निधन के ठीक तीन साल बाद इकलौता पुत्र बीमार हो गया। डाॅक्टर को दिखाया तो डाॅक्टर ने भर्ती होने को कहा। किंतु दर्द […]

चित्रगुप्त की चिंता/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

चित्रगुप्त सुबह से अविनाश कश्यप के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा करता पस्त हो गया। दोपहर हो चला पर कोई निर्णय लेने में असफल रहा। अंत में सिर पर हाथ रख कर बैठ जाता है। चित्रगुप्त को परेशान में देखकर यमराज कहता है, ‘‘चित्रगुप्त जी! आपको क्या हुआ? बहुत चिंतित लग रहे हैं।’’ ‘‘क्या बताऊँ महाराज?’’ चित्रगुप्त […]

निगाहें आसमान की ओर/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

जेठ मास की अंतिम सप्ताह तक बारिश न होने के कारण किसान से लेकर महानगर वासियों तक की निगाहें आसमान की ओर है। किसान खेत में बीज बो चुके हैं। वे बार बार आस भरी निगाहों से आसमान की ओर देखते हुए विनती करते हैं, “हे भगवान! अब तो वर्षो। कब तक बीज को धरती […]

नेताजी का घोषणा-पत्र/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

गाँव के चौक-चौराहे पर नेताजी का घोषणा-पत्र चिपकाया हुआ है। जिसमें साफ-साफ लिखा हुआ है, मुझे एक बार भारी मतों से जीताने का काम कीजिए। फिर मेरी करामत देखिए। पूरे गाँव के युवाओं को सरकारी नौकरी दिलाऊँगा। दो माह के भीतर हवाई अड्डे की सुविधा उपलब्ध कराया जायेगा। जिससे युवाओं को बाहर परीक्षा या साक्षात्कार […]

फ़िक्र/डाॅ. मृत्युंजय कोईरी

जूली अपने दो माह के शिशु को अपने खेत की मेंड़ पर सुलाकर पति के संग मटर की फलियां तोड़ने लगी । पति मटर की फलियां तोड़ते हुआ कहता है, “मुन्ना की मां! जल्दी-जल्दी मटर की फलियां तोड़ो! दो घंटे में व्यापारी फलियां लेने आएगा।” जुली मटर की फलियां तोड़ते हुए पति से कहती है, […]