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तुम पर कोई गीत लिखूँ/गीत/धीरज श्रीवास्तव

बहुत दिनोँ से सोच रहा हूँ तुम पर कोई गीत लिखूँ। अन्तर्मन के कोरे कागज पर तुमको मनमीत लिखूँ। लिख दूँ कैसे नजर तुम्हारी दिल के पार उतरती है ! और कामना कैसे मेरी तुमको देख सँवरती है ! पंछी जैसे चहक रहे इस मन की सच्ची प्रीत लिखूँ। बहुत दिनोँ से सोच रहा हूँ […]

रक्षा करना राम/गीत/धीरज श्रीवास्तव

मन मैंना का इमली जैसा तन ज्यों कच्चा आम। घूर रही हैं कामुक नजरें रक्षा करना राम।। गली गली टर्राकर मेंढक खूब जताते प्यार  ! मारें बाज झपट्टे निश दिन टपकाते हैं लार ! उल्लू अक्सर आँख मारते गिद्ध करे बदनाम । दारू पीकर  कछुए ताड़ें सर्प रहे फुफकार ! गिरगिट करें इशारे फूहड़ घोंघों […]

ये उदासी प्राण लेकर जा रही/गीत/धीरज श्रीवास्तव

ये उदासी प्राण लेकर जा रही हो सके तो तुम चली आओ प्रिये। भावनाएँ राधिका सी, हो गयीं हैं बावरी! कृष्ण गोरे हो गये हैं, गोपियाँ सब साँवरी! घोलती थी मधु कभी जो कान में बाँसुरी वह तान लेकर जा रही हो सके तो तुम चली आओ प्रिये। सोच के हर दायरे में उलझनों के […]

हो सके तो माफ करना/गीत/धीरज श्रीवास्तव

हो सके तो माफ करना हाथ जोड़े जा रहा हूँ। जिन्दगी सम्बन्ध तुमसे आज तोड़े जा रहा हूँ। चुभ रहे थे ये हृदय में रोज बनकर शूल से! जो लगे थे पैरहन पर दाग मेरी भूल से! आँसुओं ने धो दिए अब बस निचोड़े जा रहा हूँ। जिन्दगी सम्बन्ध तुमसे आज तोड़े जा रहा हूँ। […]

आज़ादीः एक ऐसी लौ जो कभी नहीं बुझती/शाश्वत मिश्रा

  आज हम गर्व, हँसी और खुशी के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। जैसे ही तिरंगे के तीन रंग विशाल आकाश में लहराते हैं, हमारे हृदय गर्व, आशा, शक्ति और एकता से भर जाते हैं। लेकिन, इसके साथ ही, हम अपने राष्ट्र के उन वीर यो‌द्धाओं को भी याद करते हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की […]

आसमानी तारे/पंजाबी लघुकथा/रजनी

शहर के एक बड़े बिल्डर सुरजीत ने जब अपने बेटे हरनूर के जन्मदिन पर आईफोन लेकर दिया तब हरनूर अपने दोस्तों को अपना आईफोन दिखाता हुआ एक बड़े रेस्टोरेंट में जन्मदिन की पार्टी देने चला जाता है।पार्किंग के एक तरफ से एक छोटा सा बच्चा मैली कमीज डालें हाथ में गुब्बारे पकड़े हरनूर के आगे […]

काश !/पंजाबी लघुकथा/रजनी

“हैलो… हैलो… जसविंदर पुत्र,तुझे मेरी आवाज सुन रही है?” जसविंदर की मां ने कनाडा गए हुए अपने बेटे को फोन करते हुए पूछा। “हां मां ,आवाज तो आ रही है पर मैं एक जरूरी मीटिंग में व्यस्त हूं इसलिए मैं आपके साथ शाम को बात करूंगा।” जसविंदर की मां इसके आगे कुछ बोलती उससे पहले […]

सांझा दर्द/पंजाबी लघुकथा/रजनी

गुरप्रीत पांचवी कक्षा की चुलबुली सी बच्ची है। सारा दिन इधर से उधर बिना मतलब के घूमती रहती उसके पैरों को कभी भी चैन न था। उसकी कक्षा में नसीबो उसकी सबसे पक्की सहेली थी जो की गुरप्रीत के घर के नजदीक ही रहती थी। वह दोनों स्कूल इकट्ठी आती जाती और शाम को भी […]

चक्की में पिसता इंसान/पंजाबी लघुकथा/रजनी

शिवजोत जब आज ऑफिस से घर देरी से पहुंचा तब सोफे पर थकावट के कारण ऐसे गिर गया जैसे कि पता नहीं कितने सालों की थकावट उसके अंदर घर कर चुकी थे इतने में शिवजोत की पत्नी रसोई में से बड़बड़ाती हुई आई और कहती है कि जब हम नौकरी पर जाते हैं तब बीजी( […]

लावारिस घड़े (मटके)/पंजाबी लघुकथा/रजनी

गुरदीप और उसकी पत्नी जीतो आधे घंटे से बस अड्डे पर गांव डिंडोर जाने के लिए तेज धूप में खड़े थे। जीतो याद करती है कि करीब पन्द्रह साल पहले जब वह इस गांव में शादी के बाद आई थी तब इस बस अड्डे पर बहुत सारे पेड़ लगे हुए थे और जीतो अपने मायके […]