उसको चौकीदार उसको पासबां क्यूं कर कहें/गज़ल/संगीता श्रीवास्तव ‘सुमन’

लेखक

  • संगीता श्रीवास्तव 'सुमन'
    पिता - श्री मधुसूदन तिवारी
    माता -श्रीमती मीना तिवारी
    पति -आशुतोष श्रीवास्तव
    जन्म -05.03.1978
    स्थान - रायपुर, छत्तीसगढ़
    शिक्षा - एम. ए. हिंदी साहित्य,
    एम. ए. इन लोक प्रशासन,
    मास्टर इन जर्नलिज़्म
    विशेष - वाणी सर्टिफिकेट प्राप्त
    संगीत- अध्ययनरत

    प्रकाशित कृतियाँ -
    एकल काव्य संग्रह- 'झरते पलाश'
    ग़ज़ल संग्रह- 'एक लड़की बचा के रक्खी है' ( उर्दू में)
    साझा संकलन - 'नन्हीं नन्हीं ख़्वाहिशें',
    'मंज़िल की ओर' शे'री मज्मुआ, 'आंचलिका- साझा काव्य संग्रह', रेत पर चलती नाव' , 'मेरी ज़िन्दगी मेरे हमसफ़र' और इंकिलाब-ए-ग़ज़लगोई गुलदस्ता-ए-ग़ज़ल , काव्यांश आदि।

    वर्ष 1999 से 2007 तक पत्रकारिता के क्षेत्र में विविध भूमिकाओं में सक्रिय रही।

    कार्यानुभव - DD News दिल्ली , Etv news हैदराबाद,
    समाचार वाचिका, स्क्रिप्ट राइटर से लेकर सामाजिक क्षेत्रों में विविध भूमिकायें
    सिटी रिपोर्टर दैनिक भास्कर पत्र समूह, बिलासपुर छत्तीसगढ़

    विधा -कविता, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहा, आलेख आदि।

    सम्मान - 'श्रेष्ठ सृजन', 'सर्वश्रेष्ठ रचनाकार' , 'उभरती युवा कवयित्री', 'वन्दे भारत वसुंधरा' -सृजन सम्मान, सहित अन्य साहित्यिक एवं सामाजिक सम्मान, फ़ेसबुक पर संचालित विभिन्न साहित्यिक समूहों द्वारा सम्मानित,
    साहित्यिक के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए के. के. एफ छिंदवाड़ा द्वारा सम्मानित
    उर्दू अदब से जुड़ी साहित्यिक संस्था लाल -ओ -गोहर, उज्जैन द्वारा ऐज़ाज़ी सनद
    मप्र उर्दू अकादमी और हिंदी साहित्य अकादमी के मुशायरे और कवि सम्मेलन में शिरकत

    पत्र -पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन

    सम्प्रति - आकाशवाणी एवं स्वतंत्र लेखन से सम्बद्ध
    मेल आईडी - sangeetasriv79@gmail. com

    पता- काली बाड़ी हिल्स, किड्जी स्कूल के पास, छिंदवाड़ा मप्र
    पिन- 480001
    सम्पर्क -9575065333

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उसको चौकीदार उसको पासबां क्यूं कर कहें
बोलो इक सैय्याद को हम बाग़बां क्यूं कर कहें

और कब तक सब्र रक्खें नाक में दम कर दिया
ज़िंदगी की मुश्किलों को इम्तिहां कब
तक कहें

धोका देते हैं शराफ़त के लबादे ओढ़ कर
रहजनों को रहनुमा-ए-कारवां क्यूं कर कहें

तू ही क़ातिल, तू ही मुंसिफ़ और जब तू ही वक़ील
तू कहलवाए उसे अपना बयां क्यूं कर कहें

गर लगे कहने तो बातों में गुज़र जाएगी शब
हम शबे हिजरां की उनसे दास्तां क्यूं कर कहें

ये तो हर बरसात में अपना बदल लेता है रंग
ऐसे संग-ए-मील को रू-ए-रवां क्यूं कर कहें

हैं मिरे गुलदान में अब भी तिरी यादों के फूल
सूखे फूलों को ‘सुमन’ हम गुलसितां क्यूं कर कहें

उसको चौकीदार उसको पासबां क्यूं कर कहें/गज़ल/संगीता श्रीवास्तव ‘सुमन’

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