मुक्तक/वसंत जमशेदपुरी
तुम धरती हो मैं अंबर हूँ,तुम सरिता मैं सागर हूँ | तुम वृषभानु लली कुसुमांगी,मैं नटखट नट नागर हूँ | तुम मरीचिका हो मरुधर की,मैं हूँ मदमाता सावन- तप्त देह को सिंचित करने,आया ले जल-गागर हूँ | जिस सावन में मेघ न बरसे,वह सावन क्या सावन है | परिरंभन की चाह न हो […]
