Year: 2025

मुक्तक/वसंत जमशेदपुरी

तुम धरती हो मैं अंबर हूँ,तुम सरिता मैं सागर हूँ | तुम वृषभानु लली कुसुमांगी,मैं नटखट नट नागर हूँ | तुम मरीचिका हो मरुधर की,मैं हूँ मदमाता सावन- तप्त देह को सिंचित करने,आया ले जल-गागर हूँ |     जिस सावन में मेघ न बरसे,वह सावन क्या सावन है | परिरंभन की चाह न हो […]

महकी है यह रजनीगंधा/सजल/वसंत जमशेदपुरी

महकी है यह रजनीगंधा या तेरे तन की खुशबू है | अलकें लहराईं हैं तूने या चंदन-वन की खुशबू है || तेरी इस उन्मुक्त हँसी पर तीनों लोक निछावर शुभदे | तेरे अधरों से निःसृत यह नंदन कानन की खुशबू है || कस्तूरी-मृग-सा चंचल मैं इधर-उधर नजरें दौड़ाऊँ | अब तक समझ नहीं पाया क्यों […]

हर अँधेरी वीथिका को जगमगाना चाहता हूँ/सजल/वसंत जमशेदपुरी

हर अँधेरी वीथिका को जगमगाना चाहता हूँ | गीत कोई प्रीति का मैं गुनगुनाना चाहता हूँ || प्रीति हो तो राधिका-सी कुछ न चाहा श्याम से | प्रीति की यह रीति ही सबको सिखाना चाहता हूँ || दूर तुम मुझसे रहो स्वीकार यह मुझको नहीं | जिस तरह भी हो जुगत मैं पास आना चाहता […]

सुबह-सुबह कोयल का गाना/सजल/वसंत जमशेदपुरी

सुबह-सुबह कोयल का गाना,अच्छा लगता है | प्रियजन से मिलना-बतियाना,अच्छा लगता है || रजनीगंधा,जुही,चमेली,शेफाली महके | उपवन में भँवरों का आना, अच्छा लगता है || उसकी गलियों में गुल चुनना, कौन नहीं चाहे | दामन में खुशबू भर लाना,अच्छा लगता है || कलियों-सा मुस्काना उसका,शहदीली बातें | बात-बात पर खिल-खिल जाना अच्छा लगता है || […]

मुझको तो सागर से गहरा/गीत/वसंत जमशेदपुरी

कर मेरे  पतवार थमा दो तो ही पार लगे। मुझको तो सागर से गहरा प्रिय का प्यार लगे।। हहराती नगपति से उतरी , चट्टानों से  टकराती । कुछ इतराती , कुछ घबराती, मन ही मन में पछताती। पिया-मिलन की आस सँजोए, बाबुल का घर छोड़ चली- टेढे़-मेढे़ रस्ते नापे, मैं इठलाती बलखाती । मुझको जीवन […]

आजा प्रीतम प्यारे/गीत/वसंत जमशेदपुरी

जब-जब मेघ झरे अंबर से झंझा पंथ बुहारे । तब-तब प्रीत-पखेरू बोले आजा प्रीतम प्यारे ।। ठंडी-ठंडी पुरवाई ये तन में अगन लगाए , रिमझिम-रिमझिम मेहा मेरे- मन की प्यास बढा़ए। गरज-तरज तन-मन को पीड़ित- करते घन-कजरारे ।। तपती धरती को अंबर ने हौले से दुलराया , जैसे परदेशी बालम बिन पाती द्वारे आया। और […]

मैं झोली में ले कर आया/गीत/वसंत जमशेदपुरी

मैं झोली में ले कर आया , कुछ मोती कुछ कंकड़-पत्थर। तुमको यदि स्वीकार नहीं तो , और नहीं कुछ इससे बेहतर ।। मैंने वचन दिया था तुमको , गीत तुम्हारे नाम लिखूँगा । जब-जब उगता सूरज देखूँ , दिलबर तुम्हें सलाम लिखूँगा। इसीलिए निकले हैं कैसे- गीत मेरे देखो सज-धज कर।।  गीत तुम्हारे अधरों […]

समीक्ष्य कृति : कुंडलिया कलश/कुंडलियाकार: मनजीत कौर ‘मीत’/डाॅ. बिपिन पाण्डेय

समीक्ष्य कृति : कुंडलिया कलश कुंडलियाकार: मनजीत कौर ‘मीत’ प्रकाशक : साहित्य 24 पब्लिकेशन, पालम विलेज, नई दिल्ली-45 पृष्ठ: 120 ( पेपरबैक) संस्करण : प्रथम (2025) मूल्य: ₹199/- मनजीत कौर ‘मीत’ एक सुपरिचित कुंडलियाकार हैं। वे मेरे संपादन में प्रकाशित ‘आधी आबादी की कुंडलियाँ’ का हिस्सा रही हैं। अभी हाल में ही उनका एक कुंडलिया […]

समीक्ष्य कृति: सपनों से जब निकले हम (ग़ज़ल संग्रह)/ग़ज़लकार : सोनरूपा विशाल/डाॅ. बिपिन पाण्डेय

समीक्ष्य कृति: सपनों से जब निकले हम (ग़ज़ल संग्रह) ग़ज़लकार : सोनरूपा विशाल प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली संस्करण: प्रथम (2024) पृष्ठ: 112 मूल्य : ₹299 ( सजिल्द) सपनों से जब निकले हम : अनुभूतियों ,संवेदनाओं और यथार्थ की त्रिवेणी प्रिय राहुल शिवाय जी समय-समय पर मुझे ऐसी कृतियों से रूबरू कराते रहते हैं जो […]

चलल लाठी, पूजायल चौरि/आलेख/प्रवीण वशिष्ठ

कुछ आख्यानों और सुनी सुनाई घटनाओं के पीछे लंबा मौखिक इतिहास होता है। ऐसे लोक आख्यानों के बारे में चर्चा- परिचर्चा करना एक प्रासंगिक पहल हो सकता है। कभी-कभी हम किसी समृद्ध परंपरा या लोक मान्यताओं के बारे में पढ़ते हैं तो उसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं, लेकिन यथार्थ में उन परंपरा एवं मान्यताओं के […]