बहुत रही बाबुल घर दुल्हन/कविता/अमीर खुसरो
बहुत रही बाबुल घर दुल्हन, चल तोरे पी ने बुलाई। बहुत खेल खेली सखियन से, अन्त करी लरिकाई। न्हाय धोय के बस्तर पहिरे, सब ही सिंगार बनाई। बिदा करन को कुटुम्ब सब आए, सगरे लोग लुगाई। चार कहार मिल डोलिया उठाई, संग परोहत नाई। चले ही बनेगी होत कहाँ है, नैनन नीर बहाई। अन्त बिदा […]
