गद्य

हीरे का हार/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

1 आज सवेरे ही से गुलाबदेई काम में लगी हुई है। उसने अपने मिट्टी के घर के आँगन को गोबर से लीपा है, उस पर पीसे हुए चावल से मंडन माँडे हैं। घर की देहली पर उसी चावल के आटे से लीकें खैंची हैं और उन पर अक्षत और बिल्‍वपत्र रक्‍खे हैं। दूब की नौ […]

मारेसि मोहिं कुठाँव/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

जब कैकेयी ने दशरथ से यह वर माँगा कि राम को वनवास दे दो तब दशरथ तिलमिला उठे, कहने लगे कि चाहे मेरा सिर माँग ले अभी दे दूँगा, किन्तु मुझे राम के विरह से मत मार। गोसाईं तुलसीदासजी के भाव भरे शब्दों में राजा ने सिर धुन कर लम्बी साँस भर कर कहा ‘मारेसि […]

कछुआ-धरम/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

‘मनुस्मृति’ में कहा गया है कि जहाँ गुरु की निंदा या असत्कथा हो रही हो वहाँ पर भले आदमी को चाहिए कि कान बंद कर ले या कहीं उठकर चला जाए। यह हिंदुओं के या हिंदुस्तानी सभ्यता के कछुआ धरम का आदर्श है। ध्यान रहे कि मनु महाराज ने न सुनने जोग गुरु की कलंक-कथा […]

शिक्षा के आदर्शों में परिवर्तन/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

पहले यह माना जाता था कि विद्या कोई बाहरी चीज़ है जिसे गुरु पढ़नेवाले के हृदय में घुसेड़ता है। पढ़नेवाले का हृदय कोरा काग़ज़ है और उस पर गुरु नए अक्षर और नए संस्कार अंकित करता है। उसके ख़ाली मस्तिष्क में या पोल मन में कोई बहुमूल्य पदार्थ बाहर से भरा जाता है जैसा कि […]

धर्मपरायण रीक्ष/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

1 सायंकाल हुआ ही चाहता है। जिस प्रकार पक्षी अपना आराम का समय आया देख अपने-अपने खेतों का सहारा ले रहे हैं उसी प्रकार हिंस्र श्‍वापद भी अपनी अव्याहत गति समझ कर कंदराओं से निकलने लगे हैं। भगवान सूर्य प्रकृति को अपना मुख फिर एक बार दिखा कर निद्रा के लिए करवट लेने वाले ही […]

सुखमय जीवन/चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

1 परीक्षा देने के पीछे और उसके फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर ‘कहावती आठ हफ्ते’ में कितने दिन घटते हैं, यह गिनते हैं। […]

लघु-कथाएँ/चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

गालियां एक गांव में बारात जीमने बैठी । उस समय स्त्रियां समधियों को गालियां गाती हैं, पर गालियां न गाई जाती देख नागरिक सुधारक बाराती को बड़ा हर्ष हुआ । वहग्राम के एक वृद्ध से कह बैठा, “बड़ी खुशी की बात है कि आपके यहाँ इतनीतरक्की हो गई है।” बुड्ढा बोला, “हाँ साहब, तरक्की हो […]

परीक्षा गुरु (प्रकरण1-11)/ लाला श्रीनिवास दास

निवेदन अबतक नागरी और उर्दू भाषामैं अनेक तरह की अच्छी, अच्छी पुस्तकें तैयार हो चुकी हैं परन्तु मेरे जान इसरीतिसे कोई नहीं लिखी गई इसलिये अपनी भाषामैं यह नई चालकी पुस्तक होगी परंतु नई चाल होनेंसै ही कोई चीज अच्छी नहीं हो सक्ती बल्कि साधारण रीतिसै तो नई चालमैं तरह, तरह की भूल होनेंकी संभावना […]

परीक्षा गुरु (प्रकरण12-25)/लाला श्रीनिवास दास

प्रकरण-१२ : सुख दु:ख आत्‍मा को आधार अरु साक्षी आत्‍मा जान निज आत्माको भूलहू करियेनहिंअपमान29 (29आत्मैव ह्यात्मन: साक्षी गति रात्मा तथात्मन: भाव संस्था: स्वमात्मानं नृणां साक्षिण मुत्तमम् ।।) मनुस्‍मृति। “सुख दु:ख तो बहुधा आदमी की मानसिक बृत्तियों और शरीर की शक्ति के आधीन हैं।एक बात सै एक मनुष्‍य को अत्‍यन्त दु:ख और क्‍लेश होता है […]

परीक्षा गुरु (प्रकरण26-41)/लाला श्रीनिवास दास

प्रकरण-२६ : दिवाला कीजै समझ, न कीजिए बिना बि चार व्‍यवहार।। आय रहत जानत नहीं ? सिरको पायन भार ।। बृन्‍द। लाला मदनमोहन प्रात:काल उठते ही कुतब जानें की तैयारी कर रहे थे। साथ जानेंवाले अपनें, अपनें कपड़े लेकर आते जाते थे, इतनें मैं निहालचंद मोदी कई तकाजगीरों को साथ लेकर आ पहुँचा। इस्‍नें हरकिशोर […]