मानव नहीं दरिंदे हैं हम/नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’

लेखक

  • नरेन्द्र सोनकर 'कुमार सोनकरन'
    **शिक्षा-- स्नातक,बी.एड
    *मोबाइल नंबर--8303216841
    **जन्मतिथि--27-03-2001
    *जन्मभूमि--करछना,प्रयागराज(उत्तर प्रदेश)
    **कर्मभूमि--प्रयागराज(उत्तर प्रदेश)
    *शौक--कविता लिखना,पढ़ना और पढ़ाना,तर्क-वितर्क व शोध-विमर्श।
    **अपने बारे में चंद शब्द--
    *आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रभावित। दलित,स्त्री व प्रकृति विषयक मुद्दों पर बेबाक लेखन-प्रयत्न।
    **लेखन विधा--
    *कविता,कहानी,दोहा,हाइकु ग़ज़ल,माहिया,शायरी,नाटक,उपन्यास,आत्मकथा इत्यादि।
    **सम्मान--
    नवांकुर साहित्य मंच सीतापुर द्वारा *महर्षि वाल्मीकि सम्मान, काव्य कुमुद,कल्प कथा व राष्ट्रीय अभिनव साहित्य मंच प्रयागराज इत्यादि द्वारा दशाधिक बार प्रशस्ति पत्र व सम्मान प्राप्त।
    **रचना-प्रकाशन--
    *अमर उजाला काव्य पटल पर 350 से अधिक,जयदीप पत्रिका में 20 से अधिक,मानस पत्रिका व आइडिया सिटी न्यूज़ बनारस से दशाधिक,प्रस्फुटन पाक्षिक ई-पत्रिका,साहित्य रचना ई-पत्रिका,साहित्य कुञ्ज पत्रिका(कनाडा),ज़ख़ीरा डाट कॉम,हिंदी बोल INDIA व हम हिन्दुस्तानी USA से रचनाएं प्रकाशित।

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मानव नहीं दरिंदे हैं हम,
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम,
प्यास हमारी जिस्मानी है,
हैवानी पर जिंदे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

कहने को बस अपनापन है,
कत्लेआम रे वहशीपन है,
रोज-रोज का पेशा अपना,
कहने को शर्मिन्दे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

हवस के भूखे-प्यासे कि
गिद्ध-सा नोंचे लाशें कि
बहन-बेटियाॅं जीएं कैसे
इतने अच्छे गंदे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

स्त्री करे पुरुष का पोषण
पुरुष करे स्त्री का शोषण
कौन मुखर हो इस मुद्दे पर
गूंगे, बहरे, अंधे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

पेड़-फूल परमार्थ वास्ते
खोल दिए कितने ही रास्ते
हमसे अच्छे पशु-पक्षी हैं
पाप-कर्म के बन्दे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

जाति-धर्म के महाशर्त में
ऊंच-नीच के महागर्त में
सरे-राह मानवता का
गला घोंटते फन्दे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

अपनी माँ ही माँ लगती है
और कोई चुम्मा लगती है
ऐसी है मानसिकता अपनी
भारत के बाशिंदे हैं हम।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम।
मनबढ़ मस्त परिंदे हैं हम।।

मानव नहीं दरिंदे हैं हम/नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’

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