पुस्तक समीक्षाःआसमान में कितने तारे (बालकविता–संग्रह, पृष्ठ-59, बालकविताएँ-51) 

लेखक

  • सुरजीत मान जलईया सिंह

    सुरजीत मान जलईया सिंह
    पिता का नाम- कर्मवीर सिंह
    माता का नाम- राजेन्द्री देवी
    पता- गाँव-नगला नत्थू, पोस्ट-नौगाँव, तहसील-सादाबाद, जिला-हाथरस, उत्तर प्रदेश
    जन्मतिथि-28/04/1988
    शिक्षा- एम. ए.(हिन्दी) (पत्रकारिता), एल. एल. बी., बी. एड.
    प्रकाशित पुस्तकें- माँ का आँचल व आदरांजलि (दोनों काव्य कृति)
    प्रकाशन- सदी के मशहूर गज़लकार में रचनाएँ सम्मलित
    कविता के प्रमुख हस्ताक्षर में रचनाएँ सम्मलित
    आधुनिक भारत के गज़लकार में रचनाएँ सम्मलित

    मीठी सी तल्खियाँ भाग-2 में रचनाएँ प्रकाशित
    नेह के महावर में रचनाएँ सम्मलित
    आकाशवाणी व एफ एम रेडियो पर काव्यपाठ
    भारत के विभिन्न साहित्यिक संस्थानों से सम्मान एवं पुरस्कार
    भारत व अन्तराष्ट्रीय समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित एवं कई साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।

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पुस्तक समीक्षा
आसमान में कितने तारे (बालकविता–संग्रह, पृष्ठ-59, बालकविताएँ-51)
लेखक : वसंत जमशेदपुरी
प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन
मूल्य : ₹199
कविता : जीवन और बालमन का संस्कार
कविता मनुष्य की अंतरात्मा का स्वर है—वह अदृश्य शब्द-सेतु जो मन, स्मृति और संवेदना को जोड़ता है। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण की प्रक्रिया है। साहित्य की अनेक विधाओं में कविता सबसे सूक्ष्म और प्रभावी माध्यम मानी गई है, क्योंकि वह तर्क से अधिक अनुभूति पर आधारित होती है। यदि यह सत्य है, तो बालकविता इस सत्य का सबसे निर्मल रूप है।
बालकविता बालमन के लिए वही भूमिका निभाती है, जो शिशु के लिए माँ का दूध—पोषण, सुरक्षा और आत्मीयता से भरी। बालकविता केवल तुकबंदी नहीं, बल्कि संस्कार-निर्माण का साधन है। यह बच्चे को भाषा, संवेदना, कल्पना, नैतिकता और संस्कृति से परिचित कराती है।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ स्क्रीन ने बच्चों के बचपन को लगभग निगल लिया है, वहाँ सार्थक बालसाहित्य की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। ऐसे समय में वसंत जमशेदपुरी का बालकविता संग्रह “आसमान में कितने तारे” एक आवश्यक हस्तक्षेप की तरह सामने आता है—जो बच्चों को मोबाइल की कृत्रिम दुनिया से हटाकर शब्द, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की वास्तविक दुनिया में लौटने का आमंत्रण देता है।
पुस्तक का समग्र परिवेश और दृष्टि
यह संग्रह मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि बालजीवन का जीवंत दस्तावेज़ है। वसंत जमशेदपुरी ने इसमें बचपन की सरलता, जिज्ञासा, उल्लास, करुणा और कल्पनाशीलता को बेहद संवेदनशील ढंग से चित्रित किया है।
पूरी पुस्तक में कवि की दृष्टि स्पष्ट रूप से तीन दिशाओं में काम करती दिखाई देती है—
संस्कार और नैतिक शिक्षा
प्रकृति और जीव-जगत से जुड़ाव
संस्कृति, परंपरा और इतिहास की स्मृति और देशभक्ति
कवि कहीं भी उपदेशात्मक नहीं होता; उसकी शिक्षा गीतात्मक है, सहज है और बालमन के अनुरूप है।
कवि ने अपनी पहली कविता ‘बालक की अभिलाषा’ में संतुष्टि का वह पहलू परोया है जिसे हम आज खो चुके हैं
चाह नहीं में ऑफिसर बनकर
जनता से रिश्वत खाऊँ………।
अन्न उगा सबको बतलाऊँ
मैं धरती का पुत्र किसान……  (कविता-1, पृष्ठ-9)
असंतुष्टि के इस दौर में संतुष्टि की बागवानी करती यह कविता बच्चों को यह सीख जरूर देगी कि खुशी किसी पद में नहीं अपने कर्म में है।
कवि ने अपनी कविता ‘माँ मुझे बंदूक दिला दे’ में देश भक्ति की अनन्य भावना को उकेरा है। राणा का भाला मिल जाए
मिले शिवाजी की तलवार्…॥
नेता जी से मुझे मिला दे
माँ मुझको बंदूक दिला दे……।(कविता-5, पृष्ठ-13)
यहाँ बंदूक हिंसा का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मरक्षा, साहस और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बन जाती है। आज जब नई पीढ़ी इतिहास से कटती जा रही है, यह कविता उन्हें उनके वीर अतीत की याद दिलाती है—राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे नायकों की स्मृति को जीवित रखती है।
कवि ने बालमन की वीरता-कल्पना को राष्ट्रनिर्माण की भावना से जोड़ दिया है—जो इस संग्रह की एक बड़ी उपलब्धि है।
कवि ने पुस्तक में हर पहलू पर नज़र रखी है, जब हम आज अपने खेल तमाशे भूलकर अपने बच्चों को मोबाइल की एक नई दुनिया दे चुके हैं, तब कवि उस चित्र को खींच लाया है जो उसके बालपन का रहा होगा। यहाँ बन्दर कोई जानवर ना होकर कवि के बालमन का साथी है।
खों-खों, खीं-खीं करता बंदर
खूब छलाँगे भरता बंदर……।
चश्मा चढ़ा आँख पर देखो
कैसे कॉपी जाँचे बंदर…। (कविता-8, पृष्ठ-16)
कवि की कविता रसखान के उस कौए को भी अछूता नहीं छोड़ती जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी ले जाता है।
छ्ज्जे चढ़ इठलाता कौआ
सबका ध्यान बँटाता कौआ……
एक आँख से देखे सबको
झूठ कहूँ तो काटे कौआ……।(कविता-11, पृष्ठ-19)
इसी तरह रसखान के कौए को आज के लोकगीत झूठ बोले कौआ काटे के साथ, कवि ने साहित्य के कालों के मिलन के लिए, एक सेतु की रचना की है।
वसंत जमशेदपुरी की बाल कविता ‘हम बच्चे’ काल के परिवर्तन पर एक ठोस प्रहार है। जिस आयु में बच्चे नंग-धडंग गाँव की गलियों में विचरण करते थे, वे आज प्ले स्कूलों का शिकार हो रहे हैं।
मत भेजो स्कूल हमें, हम
माँ के बिन ना रह पायेंगें……।
अच्छे वस्त्र नहीं दो पापा
चॉकलेट-टॉफी भी रोको।
लेकिन बच्चों की महफिल में
खेल रहे हमको मत टोको…(कविता-13, पृष्ठ-21)
आज के परिवेश में बच्चों से जिस तरह उनकी आयु छीनी जा रही है, यह कविता उस पर करारा व्यंग्य है। यह कविता शिक्षा की आवश्यकता को नकारती नहीं, बल्कि उसकी मानवीय संवेदना की माँग करती है।
कवि ने जिस तरह खुले आकाश के नीचे अपने बचपन को जिया और चाँद को चलते हुए देखा। वह आज के बच्चों को बताना हमारी जिम्मेदारी है।
नील गगन में चंदा मामा
कितने प्यारे लगते हो…॥
चंदा मामा यह बतलाओ
मेरे घर कब आओगे……(कविता-18, पृष्ठ-26)
चलता हुआ चांद बच्चे के मन को मोह लेता था, वह माँ से यही पूछता था माँ चाँद कहाँ जा रहा है और माँ का मौन बच्चे के मन के अनगिनत प्रश्नों पर ठहर जाता। यहाँ चाँद केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि बालसखा है—मामा है, मार्गदर्शक है, रहस्यमय अतिथि है। यह कविता बच्चों की कल्पनाशक्ति को उड़ान देती है।
आज के बच्चे किस तरह जीव-जन्तुओं के प्रेम से वंचित हो रहे हैं। कवि अपनी जिज्ञासा से प्रेमचंद की कहानी नादान दोस्त में बच्चों का चिड़िया व उसके बच्चों के प्रति दो छोटे बच्चों के प्रेम और उनकी चिंता के अनगनित प्रश्नों तक पहुँचने के साथ-साथ वह चिन्तित है कि आज  बालक इन प्रश्नों पर किसलिए मौन है। यह पीड़ा गहरी है, लेकिन कवि अपनी कविता आओ अब गैरैया रानी में उसे चित्रित कर अपने बचपन के दिनों में हमें खींच ले जाने में सफल हुआ है
छत पर रखा हुआ है पानी।
आओ अब गौरैया रानी…॥
प्रातकाल खिड़की में आना
बाट जोहते नाना-नानी……॥(कविता-25, पृष्ठ-33)
कवि ने अपनी कविता ता ता थैया द्वारा बाल्यकाल में ही बच्चों के मन में ईश्वर के प्रति आस्था के बीज अंकुरित करने का प्रयास बच्चों के मनोभावों में कृष्ण की छवि बनाने में सक्षम प्रतीत होती है।
ता-ता थैया ता-ता थैया
नाचे मेरा कृष्ण कन्हैया…॥
बाबा नन्द बैठ सुख पाते
ग्वाल-बाल सब बने गवैया…।(कविता-28, पृष्ठ-36)
यह केवल धार्मिक कविता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संस्कार की कविता है—जो बच्चों को भारतीय लोकधारा और भक्ति-परंपरा से जोड़ती है।
वसंत जी ने अपनी कविता शीश बड़ों को सदा झुकाएँ में आज के बच्चों के लिए घर, परिवार व अपनों की इज्जत व संस्कृति की सीख देती नज़र आती है।
शीश बड़ों को सदा झुकाएँ
जीवन की सब खुशियाँ पाएँ……
नानी बोली आओ बैठो,
रामायाण की कथा सुनाएँ……।(कविता-32, पृष्ठ-40)
जब बच्चे मोबाइल में रील देखने में व्यस्त हों उस समय रामायाण का पाठ आगामी भविष्य को सद मार्ग पर लाने का प्रयास के साथ-साथ परम्परा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
कवि कुनबे की बड़ी माँ मीरा अपने एक पद में यशोदा के माध्यम से कहती हैं ‘जागो बंशीवारे ललना, जागो मेरे प्यारे, रजनी बीती भोर भई है घर-घर खुले किवांरे’…माखन रोटी हाथ में लीनी गऊअन के रखवारे। अपनी कविता प्रभाती में कवि नव साहित्य में वही सृजन नये तरीके से करता हुआ बच्चों को यह सीख दे रहा है कि सुबह जल्दी जगने के हमारे जीवन में क्या लाभ हैं। हम प्रातः जग कर प्रकृति की उस अनुपम आभा को देख सकते हैं जो मन को आनन्दित कर दे।
उठो ललन पूरब में देखो……।
नव प्रभात आया है…॥ (कविता-34, पृष्ठ-42)
कवि अपनी कविता नानी में बचपन के उस जीवन को जिसे गुरुदयाल सिंह अपनी कहानी सपनों के से दिन में जीते दिखाई देते हैं, देता है
माँ की माँ है मेरी नानी…॥
बड़े प्यार से समझाती है
जब बच्चे करते मनमानी (कविता-42, पृष्ठ-50)
कवि सम्पूर्ण पुस्तक बाल मनोवृत्ति का ध्यान रखता नजर आता है। पुस्तक के प्रारम्भ से कवि अपने मनोभावों को बच्चों के मनोभावों से जोड़ता दिखा है, वह पुस्तक की कोई भी कविता हो, वह कवि के लेखन को सार्थक करती हुई बच्चों के हृदय को छूने में सफल होती प्रतीत होती है।
सुरजीत मान जलईया सिंह
पुस्तक समीक्षाःआसमान में कितने तारे (बालकविता–संग्रह, पृष्ठ-59, बालकविताएँ-51) 

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