पुस्तकः बालमन की कुण्डलियाँ

लेखक

  • सुरजीत मान जलईया सिंह

    सुरजीत मान जलईया सिंह
    पिता का नाम- कर्मवीर सिंह
    माता का नाम- राजेन्द्री देवी
    पता- गाँव-नगला नत्थू, पोस्ट-नौगाँव, तहसील-सादाबाद, जिला-हाथरस, उत्तर प्रदेश
    जन्मतिथि-28/04/1988
    शिक्षा- एम. ए.(हिन्दी) (पत्रकारिता), एल. एल. बी., बी. एड.
    प्रकाशित पुस्तकें- माँ का आँचल व आदरांजलि (दोनों काव्य कृति)
    प्रकाशन- सदी के मशहूर गज़लकार में रचनाएँ सम्मलित
    कविता के प्रमुख हस्ताक्षर में रचनाएँ सम्मलित
    आधुनिक भारत के गज़लकार में रचनाएँ सम्मलित

    मीठी सी तल्खियाँ भाग-2 में रचनाएँ प्रकाशित
    नेह के महावर में रचनाएँ सम्मलित
    आकाशवाणी व एफ एम रेडियो पर काव्यपाठ
    भारत के विभिन्न साहित्यिक संस्थानों से सम्मान एवं पुरस्कार
    भारत व अन्तराष्ट्रीय समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित एवं कई साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।

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आज के समय में हम बच्चों से अच्छे व्यवहार, अनुशासन और संस्कारों की अपेक्षा तो करते हैं, किंतु विडंबना यह है कि उस व्यवहार के निर्माण हेतु आवश्यक मार्गदर्शन देना अक्सर भूल जाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे संवेदनशील, सहृदय और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण बनें, परंतु उन्हें वह साहित्य, वह वातावरण और वह स्नेहिल दिशा कम ही दे पाते हैं, जो इन गुणों को सहज रूप से विकसित कर सके। ऐसे दौर में, जब हर व्यक्ति अपनी पहचान के प्रचार-प्रसार में व्यस्त है, जब शोर अधिक है और आत्ममंथन कम, तब चूल्हे की धीमी आँच की तरह शांत, सतत और सृजनशील लेखन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी संदर्भ में डॉ. बिपिन पाण्डेय का बाल साहित्य विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने बालमन की कोमल भावनाओं को समझते हुए जिस संवेदनशीलता और सरलता से रचना की है, वह सराहनीय है। उनकी पुस्तक ‘बालमन की कुण्डलियाँ’ न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि बालकों के मानस पर अपनी छाप छोड़ने में भी सक्षम है। इस पुस्तक का आकर्षण केवल शब्दों तक सीमित नहीं है; प्रत्येक कुण्डली के साथ दिए गए चित्र बच्चों की कल्पना को पंख प्रदान करते हैं।

मेरी सात वर्षीया बेटी इस पुस्तक को बड़े चाव से पढ़ रही है। वह हर कुण्डली को पहले लय में पढ़ती है, फिर उसके नीचे बने चित्रों में अपनी कल्पनाओं के रंग भरती है। उसके लिए यह केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि सृजन का माध्यम बन गई है। वह शब्दों को समझने का प्रयास करती है, भावों को पकड़ती है और फिर उन्हें रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। इस प्रकार यह पुस्तक पढ़ने, समझने और रचने—तीनों प्रक्रियाओं को एक साथ सक्रिय करती है।
कुण्डलियाँ छंद का एक विशिष्ट रूप हैं। पाण्डेय जी द्वारा बच्चों के लिए छंदबद्ध साहित्य की रचना न केवल परंपरा से जुड़ाव बनाए रखती है, बल्कि बच्चों में लय, ध्वनि और शब्द-संवेदना के प्रति रुचि भी उत्पन्न करती है। संभव है कि वे तत्काल छंद के नियमों को न समझें, किंतु लयात्मकता के माध्यम से सीखने की उनकी क्षमता अवश्य विकसित होती है। यह सर्वविदित है कि बच्चे गद्य की अपेक्षा पद्य को अधिक शीघ्र ग्रहण करते हैं, क्योंकि उसमें संगीतात्मकता और स्मरणीयता दोनों निहित होती हैं।

यही कारण था कि हमारी माँ और नानी ने हमें बाल्यकाल से ही लोरियाँ सुनाईं। वे लोरियाँ केवल नींद का माध्यम नहीं थीं, बल्कि भाषा, लय और संस्कार का प्रथम पाठ भी थीं। लोरी की धुन में ही प्रेम, सुरक्षा और अपनत्व का भाव समाहित होता था। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करें।
डॉ. बिपिन पाण्डेय की यह कृति उसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है। यह पुस्तक बच्चों का केवल मनोरंजन ही नहीं करती, बल्कि उन्हें संवेदनशील, कल्पनाशील और सीखने के प्रति उत्सुक बनाती है। ऐसे साहित्य की आज के समय में अत्यंत आवश्यकता है, जो शोर के बीच शांति, और भागदौड़ के बीच ठहराव का मूल्य सिखा सके।

पुस्तकः बालमन की कुण्डलियाँ

एक विचार “पुस्तकः बालमन की कुण्डलियाँ”

  1. डाॅ बिपिन पाण्डेय कहते हैं:

    हार्दिक आभार

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