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कविता

मैं कैसे अमरित बरसाऊँ/कविता/नागार्जुन

मैं कैसे अमरित बरसाऊँ बजरंगी हूँ नहीं कि निज उर चीर तुम्हें दरसाऊँ ! रस-वस का लवलेश नहीं है, नाहक ही क्यों तरसाऊँ ? सूख गया है हिया किसी को किस प्रकार सरसाऊँ ? तुम्हीं बताओ मीत कि मै कैसे अमरित बरसाऊँ ? नभ के तारे तोड़ किस तरह मैं महराब बनाऊँ ? कैसे हाकिम […]

पुलिस अफ़सर/कविता/नागार्जुन

जिनके बूटों से कीलित है, भारत माँ की छाती जिनके दीपों में जलती है, तरुण आँत की बाती ताज़ा मुंडों से करते हैं, जो पिशाच का पूजन है अस जिनके कानों को, बच्चों का कल-कूजन जिन्हें अँगूठा दिखा-दिखाकर, मौज मारते डाकू हावी है जिनके पिस्तौलों पर, गुंडों के चाकू चाँदी के जूते सहलाया करती, जिनकी […]

प्रश्न/कविता/रवीन्द्र उपाध्याय

नहीं गढ़े चाक पर हमने सूरज, चाँद और मिलती है हमें ढेर धूप-चाँदनी मौसम नहीं सजाये हमने और सेंकता है जेठ भिंगोता है सावन हमें भी हमारे हाँके नहीं चलती बयार और साँस लेने के लिए पूरे आज़ाद हैं हम अनाज, हाँ पसीने से सींच-सींच हमने उगाये हैं अनाज तब भी दाने-दाने को क्यों हैं […]

हर बार/कविता/रवीन्द्र उपाध्याय

हर बार ठोकरों ने है सिखलाया संभलना मिली जूझने की ताक़त हर बार उपेक्षाओं से जब-तब निन्दाओं ने अधिक निखारा हमको धीरज का उपहार मिला है दुख के हाथों ! घने अँधेरे ने प्रकाश की ओर धकेला घोर उदासी में आशा की किरणें चमकीं पतझड़ से ही मधुऋतु का संकेत मिला है! जब भी हुआ […]

सतपुड़ा के जंगल/भवानी प्रसाद मिश्र

सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से, ऊँघते अनमने जंगल। झाड़ ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है। बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल। सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले […]

गीत-फ़रोश/भवानी प्रसाद मिश्र

गीत–फ़रोश जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ। मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ; मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ। जी, माल देखिए दाम बताऊँगा, बेकाम नहीं है, काम बताऊंगा; कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने, कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने; यह गीत, सख़्त सरदर्द भुलाएगा; यह गीत पिया को पास बुलाएगा। […]

घर की याद/भवानी प्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सवेरा हो गया है, कब सवेरा हो गया है, ठीक से मैंने न जाना, बहुत सोकर सिर्फ़ माना— क्योंकि बादल की अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, अभी तक चुपचाप है सब, रातवाली छाप […]

सन्नाटा/भवानी प्रसाद मिश्र

तो पहले अपना नाम बता दूँ तुमको, फिर चुपके चुपके धाम बता दूँ तुमको तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे मैं अपना कोई काम बता दूँ तुमको। कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं, कुछ निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ मैं मौन नहीं हूँ, […]

गीत-फ़रोश (काव्य संग्रह)/भवानी प्रसाद मिश्र

कवि क़लम अपनी साध, और मन की बात बिलकुल ठीक कह एकाध ये कि तेरी-भर न हो तो कह, और बहते बने सादे ढंग से तो बह। जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। चीज़ ऐसी दे कि स्वाद सर चढ़ जाए बीज ऐसा बो […]

दूसरा सप्तक/भवानी प्रसाद मिश्र

कमल के फूल फूल लाया हूँ कमल के। क्या करूँ’ इनका, पसारें आप आँचल, छोड़ दूँ; हो जाए जी हल्का। किन्तु होगा क्या कमल के फूल का? कुछ नहीं होता किसी की भूल का- मेरी कि तेरी हो- ये कमल के फूल केवल भूल हैं- भूल से आँचल भरूँ ना गोद में इनका सम्भाले मैं […]

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