इस जहां से मिला जुला हूँ मैं/ग़ज़ल/सुभाष पाठक’ज़िया’
इस जहां से मिला जुला हूँ मैं, कौन सा दूध का धुला हूँ मैं। ग़ौर से देख मैं समन्दर हूँ, कौन कहता है बुलबुला हूँ मैं। कब खुली आँख से दिखा उसको, बंद की आँख तब खुला हूँ मैं। मेरी सीरत नमक के जैसी है, आंसुओं में तेरे घुला हूँ मैं। ज़िन्दगी भी तो मौत […]