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ब्लॉग

इस जहां से मिला जुला हूँ मैं/ग़ज़ल/सुभाष पाठक’ज़िया’

इस जहां से मिला जुला हूँ मैं, कौन सा दूध का धुला हूँ मैं। ग़ौर से देख मैं समन्दर हूँ, कौन कहता है बुलबुला हूँ मैं। कब खुली आँख से दिखा उसको, बंद की आँख तब खुला हूँ मैं। मेरी सीरत नमक के जैसी है, आंसुओं में तेरे घुला हूँ मैं। ज़िन्दगी भी तो मौत […]

हवा को साफ़ नदी ताल को भरे रखना/ग़ज़ल/सुभाष पाठक’ज़िया’

हवा को साफ़ नदी ताल को भरे रखना, ये चाहते हो तो जंगल सभी हरे रखना। सुखों दुखों का ही हासिल है ज़िन्दगी यारब, कहीं पे धूप कहीं छांव भी करे रखना। बुलंदियों से ख़ुदाया नवाज़ना मुझको, मगर ग़ुरूर हसद झूठ से परे रखना। किसी के खोटे सौ सिक्कों से लाख बेहतर है, भले हों […]

सर्वसुपूजित राम हैं/गीत/नन्दिता शर्मा माजी

सत्कर्मो की सोच जहाँ है, वहीं सुवन्दित राम हैं। जहाँ जहाँ मर्यादा है बस, वहीं उपस्थित राम हैं ।। निश्छल, निर्मल, उज्ज्वल उर हो, पावन धड़कन हो जिसमें। अटल प्रबल निश्चय हो जिसका, तनिक न विचलन हो जिसमें।। दृढ़ निश्चय प्रणबद्ध जहाँ है, कृतसंकल्पित राम हैं। जहाँ जहाँ मर्यादा है बस, वहीं उपस्थित राम हैं।। […]

मैं स्त्री हूँ /कविता/नन्दिता शर्मा माजी

मैं स्त्री हूँ, प्रायः घर की देवी भी कहलाती हूँ, कहीं प्रताड़ित, तो कहीं पूजी जाती हूँ, कहीं मेरा मान-सम्मान किया जाता है, कहीं मुझे कोख में ही मार दिया जाता है, कभी बड़े चाव से सोलह श्रृंगार करते है, कभी भरी सभा में मेरा वस्त्र भी हरते है, कभी वंश वृद्धि के लिए सिर […]

संहार शेष है/कविता/नन्दिता शर्मा माजी

कल्कि के धनुष की अभी, टंकार शेष है, कितनी ही सुताओं का, प्रतिकार शेष है, तीर, तलवारों से अभी श्रृंगार शेष है, शस्त्र उठा लो बेटियों, संहार शेष है, अंहकारियों के माथ का अहंकार शेष है, माँ, बहन, बेटियों की, हुंकार शेष है, निर्भया की अस्थियों में, अंगार शेष है, शस्त्र उठा लो बेटियों, संहार […]

रहे याद जो वो फसाना लिखेंगे/ग़ज़ल/नन्दिता शर्मा माजी

रहे याद जो वो फसाना लिखेंगे। कलम से पुराना ज़माना लिखेंगे।। तुम्हीं से गुलिस्तां सहर शाम मेरे। मुहब्बत भरा इक तराना लिखेंगे।। जरा सा सहारा मिला जो तुम्हारा। उसे हम हमारा खज़ाना लिखेंगे।। कहे गर ज़माना बताओ पता अब। तुम्हारे नयन को ठिकाना लिखेंगे।। लबों पर तबस्सुम रहेगी हमेशा। हक़ीक़त सनम हम छुपाना लिखेंगे।। पता […]

माया/कुण्डलिया/नन्दिता माजी शर्मा

जंगल-जंगल ढूँढ़ता, मृग कस्तूरी गन्ध। निज कुंडलि देखे नहीं, हुआ मोह में अन्ध।। हुआ मोह में अन्ध, खोज में इत-उत भटके। कानन कानन ढूँढ़, भ्रमित मन वन में अटके।। माया का यह बन्ध, डाल वह करता दंगल। अन्तस छिपी सुगन्ध, ढूँढ़ता जंगल-जंगल।।

लेखक की सैर/कुण्डलिया/नन्दिता माजी शर्मा

लेखक निकला हाट में, सोचा कर लूं सैर। यारी सारी खो गई, आया लेकर बैर।। आया लेकर बैर, प्रीति के पल्लव खो कर। लौटा करके सैर, बैर के अंकुर बो कर।। लेकर अपना जाल, खड़े पग-पग हैं भेदक। अपने सपने छोड़, इन्हीं से लड़ता लेखक।।

घुमड़ रहे हैं घन विकराले/सजल/नन्दिता माजी शर्मा

घुमड़ रहे हैं घन विकराले। दबे जा रहे विमल उजाले।। साधु-संत-मुनि ध्यानमग्न सब। काम,लोभ, मद मन में पाले।। कम कृतित्व है अधिक दिखावा। अधजल-गगरी नीर उछाले।। लाल महावर सजा पगों में। झाँक रहे हैं तलवे काले।। ढोल पीटते पर-दोषों का। निज पर लोगों के मुख ताले।। विवश क्षुधा से भिक्षु विकल है। नालों में नित […]

जिंदगी/सजल/नन्दिता माजी शर्मा

जिंदगी यह जीत भी है हार भी। फूल भी है और यह अंगार भी।। हर तरफ आघात ही आघात है। अब नहीं दिखता कहीं उपकार भी।। कर्म से ही हो सफल संकल्प शुभ। गूँज जाती जीत की गुंजार भी।। हो समर्पित मन-वचन-कर्म से मनुज। मोड़ देता है समय की धार भी।। एक छोटी चूक कर […]

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