आओ मिलकर सारे बोलें,
पेडों की जयकार।
ढल जाते हैं हर मौसम में,
ऋतुओं के अनुकूल।
सहते शीत घाम की बाधा,
देते हैं फल फूल।
वेद-ऋचाओं में ऋषियों ने,
माना है आभार।
मंडराते हैं बादल इनपर,
पाखी को दें ठौर।
ढूँढा, इनके जैसा दानी,
मिला कहीं ना और।
जीवन भर हम सब पर करते,
रहते हैं उपकार।
हममें से हर एक लगाए,
जीवन में दो पेड़।
खेतों में हरियाली होगी,
सुंदर होगी मेड़।
पेड़ लगाना पेड़ बचाना,
है जीवन का सार।
भेद न करते भाव न खाते,
प्रेम लुटाते हैं।
बातें करके इनसे देखो,
ये बतियाते हैं।
इनके जैसा ही करना है,
जीवन को गुलज़ार।
माँ के नाम चलो हम मिलकर,
पेड़ लगाएँ एक।
इस जीवन में इससे अच्छा,
काम न होगा नेक।
पेड़ लगाकर आज चलो दें,
ममता को उपहार।
पेडों की जयकार/गीत/मनोज जैन
