लेखक
-
संजीव प्रभाकर
जन्म : 03 फरवरी 1980
View all posts
शिक्षा: एम बी ए
एक ग़ज़ल संग्रह ‘ये और बात है’ प्रकाशित और अमन चाँदपुरी पुरस्कार 2022 से पुरस्कृत
आकाशवाणी अहमदबाद और वडोदरा से ग़ज़लों का प्रसारण
भारतीय वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त
सम्पर्क: एस-4, सुरभि - 208 , सेक्टर : 29
गाँधीनगर 382021 (गुजरात)
ईमेल: sanjeevprabhakar2010@gmail.com मोब: 9082136889 / 9427775696
कुछेक दिन हम ये काम करते,उसी की महफ़िल में शाम करते,
सुना है मैंने कि चाँद तारे वहाँ पर आकर क़याम करते।
जहाँ से भटके वहीं था रस्ता , जहाँ से लौटे वहीं थी मंज़िल,
तमाम उम्रें गयीं हमारी पता, ठिकाना, मुकाम करते।
न और कुछ, वो सुकून देता इसीलिए हैं लगी कतारें,
बड़े-बड़े उस फकीर के दर पर आके झुकते,सलाम करते।
न कोई उसने किया इशारा न लफ्ज़ इक भी कहा किसी को,
नज़र नज़र में कहा जो उसने खड़े वहाँ पर तमाम करते।
न वक़्त का कोई दबाव दिखता, न कोई दिखता तनाव उन पर,
मुझे यक़ीं है ज़रूर कोई वो ख़ास मक़्सद से काम करते।
