तोड़कर अब पाँव की बेड़ियाँ/गज़ल/सत्यम भारती

लेखक

  • सत्यम भारती
    जन्म-20 मई 1995
    जन्मस्थान- बेगूसराय, बिहार
    शिक्षा :-
    स्नातक, बीएचयू
    परास्नातक, जेएनयू
    नेट और जेआरएफ(हिंदी)
    पीएचडी(अध्ययनरत), हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा
    सम्प्रति-
    प्रवक्ता (हिंदी)
    राजकीय मॉडल इंटर कॉलेज
    नैथला हसनपुर, बुलंदशहर

    प्रकाशित कृतियाँ-
    बिखर रहे प्रतिमान (दोहा-संग्रह)
    सुनो सदानीरा (ग़ज़ल-संग्रह)

    View all posts

तोड़कर अब पाँव की बेड़ियाँ
चाँद को छूने लगी हैं बेटियाँ

ढूँढता फिरता है वो भी खामियाँ
कर रहा है रात-दिन जो गलतियाँ

आजकल महफूज दिखती हैं कहाँ
रक्स करती शाख की वो तितलियाँ

चार दिन के बाद ही मांगे बहू
मालकिन हूँ दे दो घर की चाबियाँ

वक़्त से पहले सयानी हो गयीं
जाल में फँसती कहाँ हैं मछलियाँ

तोड़कर अब पाँव की बेड़ियाँ/गज़ल/सत्यम भारती

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *