कितने बुझे बुझे हैं मनाज़िर बहार के/ग़ज़ल/प्रेमकिरण

लेखक

  • प्रेमकिरण
    प्रकाशन- 'आग चखकर लीजिए', 'पिनकुशन', 'तिलिस्म टूटेगा' (हिन्दी ग़ज़ल संग्रह), ज़ह्राब (उर्दू ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित। ग़ज़ल एवं कविता के विभिन्न साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित। इनके अतिरिक्त हिन्दी एवं उर्दू की पत्रिकाओं में ग़ज़ल कविता, कहानी, फीचर, साक्षात्कार, पुस्तक समीक्षा, कला समीक्षा, साहित्यिक आलेख प्रकाशित।
    संपादन: समय सुरभि ग़ज़ल विशेषांक ।
    अनुवाद प्रसारण: नेपाली एवं बंगला भाषा में ग़ज़लों का अनुवाद।
    सम्मान: डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव 'शेखर' सम्मान से सम्मानित (2005)। दुष्यंत कुमार शिखर सम्मान से सम्मानित (2006)। शाद अजीमाबादी सम्मान (2007)। बिहार उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित (2009)
    प्रसारण: दूरदर्शन, आकाशवाणी, पटना के हिन्दी एवं उर्दू विभाग से कविता, कहानी एवं ग़ज़लें प्रसारित तथा अनेक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में शिरकत ।
    संपर्क: कमला कुंज, गुलज़ारबाग, पटना-800007
    मो. : +91-9334317153
    ई-मेल : premkiran2010@gmail.com

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कितने बुझे बुझे हैं मनाज़िर बहार के
पेड़ों के कौन ले गया ज़ेवर उतार के

शाख़ें हरी भरी हैं न फूलों पे तितलियां
दो रोज़ के थे सारे नज़ारे बहार के

बिखरे हुए हैं टूट के पत्ते यहां वहां
नग़्में सुनायें क्या कोई ऐसे में प्यार के

मांगे की रौशनी से उजाला है हर तरफ़
खुशियां उधार की तेरे जलवे उधार के

हैरान हो के देखता ही रह गया उसे
आया जो मेरे सामने मेकअप उतार के

अल्लाह के करम से है पर्दे में आबरू
दी थी कभी फ़क़ीर को चादर उतार के

कितने बुझे बुझे हैं मनाज़िर बहार के/ग़ज़ल/प्रेमकिरण

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