लेखक
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गरिमा सक्सेना
पिता : महेश चंद्र सक्सेना
माता : रीता सक्सेना
पति : अंजुल खरे
जन्मतिथि : 29 जनवरी 1990
शिक्षा : बी. टेक (इलेक्ट्राॅनिक्स एंड इन्सट्रयूमेंटेशन)प्रकाशित कृतियाँ-
1-दिखते नहीं निशान(दोहा संग्रह)
2-है छिपा सूरज कहाँ पर (नवगीत संग्रह)
3- हरसिंगार झरे गीतों से (गीत संग्रह)
4- एक नयी शुरुआत (दोहा संग्रह)
5- कोशिशों के पुल (नवगीत संग्रह)
6- चेहरे का जयपुर हो जाना (प्रेमगीत संग्रह)संपादित कृतियाँ- दोहे के सौ रंग (सौ रचनाकारों का सम्मिलित दोहा संग्रह) भाग१, भाग२, यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,
संवदिया पत्रिका के दोहा विशेषांक का अतिथि संपादनपत्र - पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन
सम्मान- उ. प्र. हिंदी संस्थान द्वारा बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' पुरस्कार, हिन्दुस्तानी अकादमी इलाहाबाद द्वारा युवा लेखन कविता सम्मान, नवगीत साहित्य सम्मान (नवगीतकार रामानुज त्रिपाठी स्मृति) सहित दर्जनों संस्थाओं से सम्मानित।
लेखन विधाएँ : गीत, ग़ज़ल, दोहा, कविता, लघुकथा आदि।
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन, कवर डिजायनिंग, चित्रकारी
स्थायी संपर्क : एफ-652, राजा जी पुरम, लखनऊ, उत्तर प्रदेश-226017
वर्तमान संपर्क : मकान संख्या- 212 ए-ब्लाॅक, सेंचुरी सरस अपार्टमेंट, अनंतपुरा रोड, यलहंका, बैंगलोर, कर्नाटक-560064
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मो : 7694928448
ईमेल-garimasaxena1990@gmail.com
आदमी में आदमीयत की कमी होने लगी
मौत से भी आज बदतर ज़िंदगी होने लगी
जाल ख़ुद ही था बनाया क़ैद ख़ुद उसमें हुए
फिर बताओ अब तुम्हें क्यों बेबसी होने लगी
याद को अब याद करके याद भी धुँधला रही
लग रहा तुमसे मिले जैसे सदी होने लगी
चाँद, सूरज थे बने सबके लिये इक से यहाँ
रौशनी फिर क्यों बपौती महलों की होने लगी
बेच डाले हैं बज़ारों में सभी एहसास अब
आज आँखों में यहाँ झूठी नमी होने लगी
कब हवा का मोल जाना मुफ़्त थी इफ़रात थी
बोतलों में बंद है अब क़ीमती होने लगी
आज आँसू बह रहे ‘गरिमा’ क़लम की नोंक से
घाव से रिसते लहू से शायरी होने लगी
