लेखक
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डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी
(शैक्षणिक योग्यता - संस्कृत साहित्याचार्य संस्कृत साहित्याचार्य पीएच.डी, पी.जी. डिप्लोमा पत्रकारिता एवं जनसंचार ) सेवानिवृत प्रधानाचार्य
वर्त्तमान में छंदबद्ध काव्य लेखन - में प्रकाशित पुस्तकें
1 “ वर्णिका” काव्य संग्रह, 2 “ मौन मन के द्वार पर” (गीतिका संग्रह) 3 “सुधियाँ जैसे बाँह पसारे”** (गीतिका संग्रह) कोलकाता काव्य वीणा सम्मान 2022 से पुरस्कृत* 4 “प्रणव से प्रणय तक” (छंद संग्रह )5 “ कामद प्रिया” शकुन्तला
( खण्ड काव्य) 6 महुआ महके भोरे (गीत संग्रह)7 प्रश्न अनोखे अभी शेष हैं (गीत संग्रह) 8 मन के मनके दोहरे (दोहा संग्रह )साहित्यिक उपलब्धियाँ - पुरस्कार एवं सम्मान
“काव्य वीणा” सम्मान - 2022 परिवार मिलन सामाजिक जागरण केन्द्र, कोलकाता द्वारा - “सुधियाँ जैसे बाँह पसारे” कृति पर ।
कवितालोक रत्न सम्मान, गीतिका गंगोत्री सम्मान, सारस्वत सम्मान काव्य भारती, ‘”छंद शिल्पी” सम्मान, ”कवितालोक भारती” सम्मान, सारस्वत सम्मान कवितालोक (1जुलाई 2018), कवितालोक आदित्य (4 मार्च 2019), युग्मन गौरव सम्मान, नारी सागर सम्मान द्वारा - विश्व हिंदी रचनाकार मंच दिल्ली
मुक्तक-लोक लखनऊ उ.प्र. - गीतिका श्री सम्मान, छंद श्री सम्मान, मुक्तक-लोक गीत रत्न सम्मान,
गीतकुम्भ – श्रेष्ठ गीतकार (महिला संवर्ग) गीत कुंभ (परिवार), गीतकार साहित्यिक संस्थान पंजीकृत (उत्तर प्रदेश सरकार, पंजीकरण संख्या ETH/01790/2019-2020)
सत्यं शिवं सुंदरम् साहित्य सृजन मेखला द्वारा - उत्कृष्ट रचना सम्मान
युगधारा फाउंडेशन (पंजीकृत) द्वारा - साहित्य श्री सम्मान, समाज भूषण सम्मानस्थाई निवास- रूद्र नगर, सुलतानपुर ( उ0प्र0 )228001
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वर्तमान निवास -19/303 इन्दिरा नगर लखनऊ (उ0प्र0) 226016
मोबाइल - 8787009925 , 9415301217
Email tripathi.lata@rediffmail.com
गूँगे को मीठा मिल जाये, स्वाद नहीं कहने में आये ।
आज बहुत ही खुश हूँ प्रीतम,तुम मेरे सपने में आये।
हीरे माणिक शब्द सजाकर,
तुम से पाया आँचल में ।
बिछुड़े थे हम कहाँ तुम्हारे ,
करुणा बहती काजल में ।
आँख ढरे सुरमा सुषमा से,बूँद जहाँ गलने में आये।
गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये ।
प्यारी लोरी गीत बन गयी
माँ की गोदी गुलजार हुई ।
दो नयनों की दूरी जैसे –
अब कोरों के अनुसार हुई ।
इतनी यादें कहाँ समेटूँ, प्रात सहज जगने में आये।
गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये ।
जोड़ दिया चरणों में खुद को,
नेह सजल नित अरमानों की।
घिरी आपदा तुम ने ओजी,
डटकर; आते तूफानों की ।
एक लड़ी नित प्रभु की माला,मनके बन जपने में आये ।
गूँगे को मीठा मिल जाये,स्वाद नहीं कहने में आये ।
