याद सबको आ रहे,
तातेड़ जी।
किंवदंती में,
मिलेंगे देखना,
बन गए हैं लोक की पावन कथा।
व्यक्ति ने,
व्यक्तित्व को ऐसे गढ़ा,
बन चुके थे एक पूरी संस्था।
गीत अभिनव गा रहे,
तातेड़ जी।
याद सबको आ रहे,
तातेड़ जी।
वृत्त थे,
वह साधना का—केंद्र थे,
ठौर थे निश्चित सहज पूरा पता।
शब्द स्वर के,
पारखी थे वह कुशल,
थे मनुज तन में निखालिस देवता।
राह नव दिखला रहे,
तातेड़ जी।
याद सबको आ रहे,
तातेड़ जी।
साधनारत,
हो कहीं प्रतिभा नई,
दृष्टि उनकी खोज कर लाती रही।
भाल पर,
चंदन लगाकर आत्मा,
रोज उनकी खूब सुख पाती रही।
नित्य सुधि में छा रहे,
तातेड़ जी।
याद सबको आ रहे,
तातेड़ जी।
स्मृति गीत-तातेड़ जी/गीत/मनोज जैन
