सोच रहा क्यों कोई मेरी,
वाल नहीं पढ़ता?
फोटो तो हर एक देखता,
हाल नहीं पढ़ता।
बैठे ठाले मैं एकाकी,
हर कुछ लिखता हूँ।
हूँ मैं ऐसा नहीं तुम्हें मैं,
जैसा दिखता हूँ।
समझाया जिस जिसने मुझको,
उससे जा लड़ता।
व्याकरण का दांव फेंक,
भाषा गढ़ लेता हूँ।
फिर धीरे से प्यार भरी
धमकी जड़ देता हूँ।
जड़ता में आकंठ मगन मन,
फर्क नहीं पड़ता?
सोच रहा मैं धीरे धीरे,
नीचे आ जाऊँ।
विट्ठल विट्ठल बोल बोलकर
सबको भा जाऊँ।
फूल पात फल शाख तने पर,
क्यों दिनभर चढ़ता?
चूहा जैसे मैं दाँतों को,
पैना करता हूँ।
इधर-उधर के शब्द उठा,
कविता में धरता हूँ।
रोज नया मैं हरकुछ लिखकर,
भाषा को गढ़ता।
वाल नहीं पढ़ता/गीत/मनोज जैन
