जैसे तैसे कटी अभी तक
मगर भूख से रही ठनी।
शेष बचे दिन कैसे काटे
सोच रहा है रामधनी।
कोरे स्वप्न बिछाये कब तक ,
सोये वह उम्मीदें ओढ़।
कैसे भला छिपाए आखिर,
लिए गरीबी का जो कोढ़।
पक्का याद नहीं इस घर में
कब अरहर की दाल बनी
शेष बचे दिन कैसे काटे
सोच रहा है रामधनी।
आसमान की ओर निगाहें
खपा रहा धरती पर प्रान ।
सींचे खेत पसीने से पर,
तनिक न घर में गेंहू धान।
जहाँ कहीं पर बीज बिखेरे
उगी वहाँ बस नागफनी।
शेष बचे दिन कैसे काटे
सोच रहा है रामधनी।
जीवन पथ की खुशियाँ अक्सर
क्रूर भाग्य लेता है छीन।
निष्ठुर समय उड़ाता खिल्ली
उसको देख विवश अतिदीन।
और विधाता भी करता है
जब देखो तब राहजनी!
शेष बचे दिन कैसे काटे
सोच रहा है रामधनी।
रधिया,मुन्नू और सँवरकी
दिखते सबके सब हलकान।
खींस निपोरे खड़ी जरूरत
कर्जा भरे कुटिल मुस्कान।
घर का खर्च रुपइया हर दिन
नहीं अठन्नी आमदनी।
शेष बचे दिन कैसे काटे
सोच रहा है रामधनी।
