लेखक
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अनिता रश्मि
मूलतः कथाकार। दो उपन्यास सहित चौदह किताबें।
चार सौ से अधिक विविधवर्णी रचनाएँ प्रमुख राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित।अद्यतन :
हंस सत्ता विमर्श और दलित विशेषांक के पुस्तक रूप में एक कहानी "मिरग मरीचा"
परिकथा द्वारा सत्ताईस कहानियां पुस्तक में कहानी "संकल्प"
"सरई के फूल", "हवा का झोंका थी वह" कथा संग्रह, "रास्ते बंद नहीं होते" लघुकथा संग्रह।
संपादन: डायमंड बुक्स कथामाला के अंतर्गत झारखंड की 21 नारी मन की कहानियां।अनेक प्रतिष्ठित सम्मान, पुरस्कार। इस वर्ष पांच सम्मान।
शोध में रचनाएं शामिल।
संपर्क : 1 सी, डी ब्लाॅक, सत्यभामा ग्रैंड, कुसई, डोरंडा, राँची, झारखण्ड -834002
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बाँधकर बेतरा में
अपने छउआ-पुता को
ये जो शहर की छाती पर
सँवारने शहर को घूम रही हैं
एक माँ भी हैं
बच्चा कब छाती पर,
कब पीठ से बँधे बेतरा में समा
कंगारू बन जाएगा
कह सकते नहीं,
ईंट भट्ठों, भवनों सहित सारे बाजार
सड़क-गली में छा गईं ये
श्रम का अद्भुत ईमानदार प्रतीक बन
पीठ पर बँधे अपने मुन्ने-मुन्नी के संग
नन्हां-मुन्ना सा बेतरा
पहचान है इनकी
खेत-खलिहान, पोखर-अहरा
नदी-तालाब, सागर
गोहाल-बथान, पगडंडी
कहीं भी मिल जाएँगी ये
और इनका बेतरा
क्योंकि
अपने बेतरा में ये सिर्फ
वर्त्तमान ही नहीं
भविष्य भी ढोती हैं।
* बेतरा = बच्चे को पीठ पर बाँधना
बेतरा/अनिता रश्मि
