This entry is part 17 of 22 in the series मई 2023

कागज़ी पहने हुएः विजय वाजिद

दूर तक मंज़र हैं सारे तीरगी पहने हुए

सिर्फ़ हम ही जल रहे हैं रौशनी पहने हुए

बारिशों में भीग जाने का ख़सारा उनसे पूछ

जिस्म पर जो पैराहन हैं कागज़ी पहने हुए

क्या कहूं यूं दर ब दर फिरना मुकद्दर है मेरा

पांव जब से हैं  मेरे आवारगी पहने हुए

फिर रहे हैं लोग इतराते हुए इस ख़ाक पर

जिस्म पर पोशाक अपने ख़ाक की पहने हुए

रंग जब उतरेगा हो जायेगा सब कुछ बेनकाब

मौत भी है चार दिन की ज़िंदगी पहने हुए

रूह दोनों की मुसलसल रक्स करती है “विजय”

इश्क राधा और मीरा बंदगी पहने हुए

विजय वाजिद

मई 2023

फिरे हम लोग दुनिया कोः किशन तिवारी भोपाल इक कली की तरहः मनमोहन सिंह तन्हा
कागज़ी पहने हुएः विजय वाजिद